
कृषि-खाद्य प्रणालियों में महिलाओं की भूमिका को पुनर्परिभाषित करना: सतत कृषि विकास के लिए विस्तार रणनीतियाँ” विषयक तीन दिवसीय सम्मेलन सफलता पूर्वक संपन्न,
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 पूसा। “सशक्तिकरण का मतलब केवल आय बढ़ाना नहीं, बल्कि इसमें, आर्थिक स्वावलंबन के साथ साथ आत्मनिर्भर बनने, निर्णय लेने, और गरिमापूर्ण जीवन यापन करने का अवसर प्रदान करना भी अंतर्निहित है। इस केलिए तकनीक को महिला के खेत और रसोई तक पहुंचाना होगा, तभी यह नवाचार पूरा होगा।”
सोमवार को विद्यापति सभागार में आयोजित कृषि विशेषज्ञों व वैज्ञानिकों के तीन दिवसीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पीएस पाण्डेय ने उक्त बातें कही।
प्रसार, शोध और बजट में समुचित जगह :
इस क्रम में उन्होंने कहा कि, इतिहास साक्षी है कि, हर युग में, हर दौर में महिलाएं परिवर्तन या नव सृजन का वाहक रही हैं। भारत में 70 प्रतिशत से अधिक महिलाएं कृषि से जुड़ी हैं, मगर विडम्बना यह है कि, नीति निर्धारण और तकनीक में उनकी हिस्सेदारी सीमित है। इसलिए, हमें महिलाओं को परिवर्तन वाहक मानकर प्रसार तंत्र, शोध और बजट में उन्हें समुचित जगह देनी होगी।
लिंग संवेदी प्रसार सेवाओं का रोडमैप :
बताते चलें कि, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा में 27 से 29 तक आयोजित “कृषि-खाद्य प्रणालियों में महिलाओं की भूमिका को पुनर्परिभाषित करना: सतत कृषि विकास के लिए विस्तार रणनीतियाँ” विषयक तीन दिवसीय सम्मेलन का विश्वविद्यालय स्थित विद्यापति सभागार में समारोह पूर्वक समापन हो गया। इस क्रम में सम्मेलन की प्रमुख सिफारिशें जारी की गईं और लिंग संवेदी प्रसार सेवाओं का रोडमैप प्रस्तुत किया गया।
86 शोध पत्र, 48 पोस्टर :
डॉ राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय और इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ एक्सटेंशन एजुकेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस सम्मेलन में बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और पूर्वोत्तर राज्यों से 300 से अधिक वैज्ञानिक, नीति निर्माता, प्रसार विशेषज्ञ और प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया। इस दौरान तीन दिनों में कुल 12 तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। जिसमें कुल 86 शोध पत्र, 48 पोस्टर प्रस्तुतियां और कई संदर्भित विषयों पैनल चर्चाएं हुईं।
इंटरनेट बेस्ड थिंग्स को भी बढ़ावा :
समापन सत्र को संबोधित करते हुए कुलपति डॉ. पी.एस. पांडेय ने कहा कि “यह सम्मेलन केवल अकादमिक चर्चा नहीं, बल्कि बदलाव का संकल्प है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में कृषि का स्वरूप तेजी से बदलेगा इसके लिए डिजिटल एग्रीकल्चर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं अन्य इंटरनेट बेस्ड थिंग्स को भी बढ़ावा देना होगा।”
विश्वविद्यालय की चर्चा :
इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ एक्सटेंशन एजुकेशन के अध्यक्ष एवं कृषि विश्वविद्यालय बैंगलोर के पूर्व कुलपति प्रो. के. नारायण गौड़ा ने कहा कि, “कृषि शिक्षा और अनुसंधान के तीर्थ डॉ राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के साथ इस ऐतिहासिक सम्मेलन में भागीदार बनकर उन्हें गर्वानुभूति हो रही है। विश्वविद्यालय ने पिछले तीन वर्षों में देश भर में अपना परचम लहराया है जिसकी चर्चा हर ओर है।”
उत्पादकता और पोषण स्तर :
उन्होंने कहा कि भारतीय कृषि की असली ताकत महिला किसान हैं, लेकिन हमारा प्रसार तंत्र उनकी विशेष जरूरतों को अक्सर नजरअंदाज करता रहा है। यहां प्रस्तुत शोध और केस स्टडी साबित करते हैं कि जब महिलाओं को सही उपकरण, प्रशिक्षण और मंच मिलता है तो उत्पादकता के साथ साथ परिवार के पोषण का स्तर तेजी से सुधरता है।
मील का पत्थर :
उन्होंने कहा कि, आईएनसीसीए इन सिफारिशों को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाएगा और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान व राज्य सरकारों के साथ मिलकर लिंग संवेदी रणनीतियों को मुख्यधारा के प्रसार ढांचे में शामिल करने पर काम करेगा। यह सम्मेलन विकसित भारत 2047 के लक्ष्य में महिला किसानों की भूमिका तय करने वाला मील का पत्थर बनेगा।”
महिलाओं का योगदान उल्लेखनीय :
सम्मेलन के दौरान विशेषज्ञों ने माना कि जलवायु परिवर्तन, पोषण सुरक्षा और ग्रामीण उद्यमिता की चुनौतियों का समाधान महिला किसानों को केंद्र में रखे बिना संभव नहीं है। सत्रों में बार-बार यह बात उभरी कि बीज प्रबंधन, पशुपालन, फसल कटाई उपरांत कार्य और खाद्य प्रसंस्करण में महिलाओं का उल्लेखनीय योगदान है, लेकिन ऋण, भूमि स्वामित्व, मशीनीकरण और सलाह सेवाओं तक उनकी पहुंच कम है।
बढ़ जाती है तकनीक अपनाने की दर :
आंध्र प्रदेश, ओडिशा, बिहार और महाराष्ट्र के केस स्टडी से पता चला कि, जब महिला स्टार्टअप या व्यवसायिक क्षेत्र में कदम बढ़ाती है तो तकनीक अपनाने की दर 40 से 70 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। आयोजन सचिव डॉ. राम दत्त के नेतृत्व में तैयार सिफारिशें कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, नीति आयोग और सीएसीपी को भेजी जाएंगी।
मॉडल को संस्थागत करने की जरूरत :
वहीं डॉ. उषा सिंह ने कहा कि, “कोई एक विभाग इसे अकेले हल नहीं कर सकता। केवीके, कृषि विभाग, नाबार्ड, एग्री-स्टार्टअप और महिला समूहों को मिलकर काम करना होगा। सम्मेलन ने हमें जमीन पर परखे मॉडल दिए हैं। अब इन्हें संस्थागत करने की आवश्यकता है।”
धन्यवाद ज्ञापन और प्रतिबद्धता :
स्कूल ऑफ एग्री–बिजनेस एंड रूरल मैनेजमेंट के अधिष्ठाता एवं आयोजन कमिटी के सचिव डॉ. रामदत्त ने धन्यवाद ज्ञापन के दौरान विश्वविद्यालय की ओर से सिफारिशों को कागज से खेत तक ले जाने की प्रतिबद्धता दोहराई।