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Home » मनरेगा की जगह वीबी जीरामजी बिल मजदूरों के रोजगार के अधिकार पर सीधा हमला : सुरेंद्र प्रसाद सिंह

मनरेगा की जगह वीबी जीरामजी बिल मजदूरों के रोजगार के अधिकार पर सीधा हमला : सुरेंद्र प्रसाद सिंह

Dr. Sanjay KumarBy Dr. Sanjay Kumar20/12/2025No Comments3 Mins Read
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प्रदर्शन करते माले नेता व कार्यकर्ता।

ओईनी न्यूज नेटवर्क।

Oini 24 डेस्क ताजपुर। योजना का नाम मनरेगा से बदलकर जी-राम-जी करना महात्मा गांधी को उपेक्षित और भगवान राम का सीधा अपमान है। यह बीजेपी-आरएसएस की गांधी के प्रति परंपरागत दुश्मनी और भगवान राम के प्रति भावशून्यता को दर्शाता है।

भाकपा माले प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने शनिवार को रहीमाबाद एवं क़स्बे आहर लोकल कमिटी की बैठक के बाद प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उक्त बातें कही। अपने संबोधन में उन्होंने बीजेपी सरकार से तुरंत वीबी जीरामजी विधेयक वापस लेने, मनरेगा को सार्वभौम बनाकर और ज़रूरी फंड देकर इसे मज़बूत करने की मांग की।

इस अवसर पर माले नेता ने बताया कि भाजपा सरकार के महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम-Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (मनरेगा-MGNREGA) को विकसित भारत-रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक 2025 (वीबी-जीरामजी विधेयक-Viksit Bharat Guarantee for Rojgar and Ajeevika Mission (Gramin)- VB-G RAM G Bill 2025, में बदलने के कुकृत्य का भाकपा माले पुरजोर विरोध करेगी।

उन्होंने कहा कि मजदूरों केलिए रोजगार की गारंटी देने वाला यह ऐतिहासिक कानून मनरेगा यूपीए सरकार द्वारा वामपंथी दलों के दबाव के कारण लागू किया गया था। जो एक सार्वभौमिक, मांग-आधारित कानून है जो काम का सीमित अधिकार प्रदान करता है। जबकि नया विधेयक जहां मनरेगा के स्वरूप को बदलता है वहीं लोगों को सीमित अधिकार भी नहीं देता है।

यह कानूनी तौर पर केंद्र सरकार को मांग के अनुसार फंड आवंटित करने की अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त करता है। सरकार का 100 से 125 दिन तक गारंटीशुदा रोज़गार बढ़ाने का दावा उसके जाने-माने जुमलों में से एक और जुमला मात्र है।

माले नेता ने कहा कि यह विधेयक जॉब कार्ड को तर्कसंगत बनाने के नाम पर यह नया विधेयक ग्रामीण परिवारों के बड़े हिस्सों को बाहर कर देता है। खेती के चरम मौसम के दौरान 60 दिनों तक रोज़गार का निलंबन उन्हें ज़मींदारों पर निर्भर बना देगा। क्योंकि इस विधेयक के अनुसार उन्हें तब काम नहीं मिलेगा जब उन्हें कम की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी। ऊपर से अनिवार्य डिजिटल हाज़िरी, जिसमें मज़दूरों को बहुत ज़्यादा कठिनाइयाँ होती हैं, जिससे काम का नुकसान और उनके अधिकारों से वंचित होना शामिल है।

फंडिंग के पैटर्न में बदलाव का प्रस्ताव करके, केंद्र अपनी ज़िम्मेदारी राज्यों पर डाल रहा है। इससे राज्य सरकारों पर एक असहनीय वित्तीय बोझ पड़ेगा, जबकि इस संबंध में निर्णय लेने की प्रक्रिया में राज्यों को कोई भूमिका नहीं दी जाती है। राज्यों से बेरोज़गारी भत्ता और देरी के मुआवज़े का खर्च भी उठाने की उम्मीद की जाती है।

श्री सिंह ने कहा कि इन सभी बदलावों का मकसद योजना की आम जनता तक पहुँच को कम करना और केंद्र सरकार की जवाबदेही को कमतर करना है।

 मौके पर आसिफ होदा, मो० एजाज, चांद बाबू, राजदेव प्रसाद सिंह, महावीर सिंह, दिनेश प्रसाद सिंह, संजीव राय, मुंशीलाल राय, ललन दास, मो० शकील, शंकर महतो, अनील सिंह समेत बड़ी संख्या में माले कार्यकर्ता उपस्थित थे।

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