
समस्तीपुर । जब सफलता कदम चुमें तो जाने अनजाने कई लोगों के बीच रहते गुजरते वक्त का पता नहीं चलता। मगर एक असफलता में अपना साया भी साथ छोड़ देता है। अपनी असफलता को उर्जा का स्रोत बनाने वाला ही दुनिया को एक नई राह दिखाता है।


कुछ ऐसा ही रहा – है मिथिला पेंटिंग में समस्तीपुर की शान, जिले का गौरव कुन्दन कुमार रॉय का जीवन। आज मिथिला पेंटिंग की रंगीन दुनिया में, उंगलियों और कल्पनाशीलता की ताकत के दम पर रंगों की जादूगरी से हर वय के दिलों पर राज करने वाले कुन्दन रॉय आज बेशक किसी परिचय के मोहताज नहीं।


जिला ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर कई सरकारी विज्ञापनों में श्री रॉय की पेंटिंग उनके सफलता की कहानी कहती है। जबकि हकीकत यह है कि वे वर्णान्धता के शिकार है। कुछेक रंगों को छोड कर कोई रंग वे नहीं पहचान सकते। मगर कहते है ने कुछ कर गुजरने की ललक सच्ची हो, ललक को साकार करने का संकल्प सच्चा हो तो मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए।

अपनी कमियों से डरे नहीं बल्कि उसे अपना हथियार बना कर आगे बढ़े। श्री रॉय ने भी कुछ ऐसा ही किया। उन्हें चित्रकारी का शौक अपनी मां से विरासत में मिला था। मगर कलर ब्लाईडनेस के कारण पेन्टिंग का शौक परवान चढ़ता नहीं दिखा तो एमबीए के बाद नौकरी की किन्तु समाजिक कार्यों से जुड़े रहे। मगर पेंटिंग से दूर होने की कसक रह रह कर उन्हें उदास व मायूस कर देती थी।

संवाददाता से एक निजी बातचीत के दौरान अतीत में झाँकते हुए उन्होंने कहा कि मुझे याद है जब पहली बार गीता नायडू जी ने मुझे एक पेंटिंग प्रतियोगिता में भाग लेने को कहा था। मैं परेशान था क्या करूँ। मेरी बहन अंकिता ने रास्ता दिखाया। उसने कहा था कि आपको रंग पहचानने में दिक्कत है पढने में तो नहीं। आप डिब्बों पर रंगों का नाम पढ कर रंगों का प्रयोग कर सकते है।

बस फिर क्या था, अपने जीवन के उस पहले प्रतियोगिता मे में रनर अप रहा था। श्री रॉय ने बताया कि सफर में पद्मभूषण शारदा सिन्हा, चंचल वैद्य, हारून खान, ए कुमार, अविनाश रॉय, जैसे महान विभुतियों ने मुझे निरंतर बढते रहने को प्रेरित किया। धीरे-धीरे मै सरकारी-गैर सरकारी संस्थाओं से जुड़कर लोगों को मोटीवेट करने लगा।

जिला उद्योग केन्द्र, बिहार सरकार के बनो उद्यमी अभियान से जुड़ कर बच्चे, महिलाओं, युवाओ को स्वरोजगार के लिए प्रेरित व सकारात्मकता, स्वाभिमानी, आत्मविश्वास से जुड़ी कहानियों से जागृत करने लगा। स्लम से लेकर स्कूल के बच्चों को मूर्ती बनाना और पेटिंग सिखाने लगा। श्री रॉय ने कहा कि विश्वास करें ईश्वर कभी किसी के साथ नाइंसाफी नहीं करता। भगवान ने हर किसी के अंदर कुछ कमी दी है तो सभी में कुछ खास भी दिया है। बस देर है तो अपने अंदर की खासियत को पहचान कर अपनी शक्सियत बनाने की।

अद्भुत कल्पनाशीलता और साधना के दम पर रंगो की पहचान नहीं रखने वाले कुंदन आज रंगों की दुनिया के कुंदन बन गये है। इसकेलिए उन्हें भारत श्री पुरस्कार, बिहार गौरव पुरस्कार, यूथ आइकॉन ऑफ इंडिया पुरस्कार, बिहार शौर्य पुरस्कार, प्राइड ऑफ बिहार पुरस्कार, गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड पुरस्कार, तेजस कला रत्न पुरस्कार सहित दर्जनाधिक जिला से राष्ट्रीय स्तर तक के पुरस्कार प्रदान किया जा चुका है।
