
Oini 24
ओईनी न्यूजा नेटवर्क समस्तीपुर। हमारी संस्कृति में पेड-पौधे, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, धरती-आकाश, सुर्य-चंद्रमा यहां तक कि बादलों की पूजा अर्चना करने की परंपरा पौराणिक काल से ही चली आ रही है। इसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्स है नागपंचमी।
नागपंचमी को लेकर जिले भर में उत्साह एवं उमंग माहौल रहा। जगह-जगह मंगलवार को सांपो का जुलूस निकाला गया। जुलूस में शामिल सभी लोगों ने हाथ और सिर पर सांप धारण कर रखा था। सांपों के इस जुलूस देखने के लिए सडक के दोनो ओर बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ जुटी थी।
इस दौरान जिले के सिंघिया, विभूतिपुर, रोसड़ा, शिवाजीनगर, खानपुर वारिसनगर समेत विभिन्न प्रखंडों में भगत की अगुवाई में सांपों का जुलूस निकाला गया। विगत कुछ सालों से जिले में नागपंचमी पर सांपों का जुलूस निकालने की परंपरा चली आ रही है।
जुलूस निकालने के पूर्व भगत तालाब और नदी में डुबकी लगा पानी के अंदर से सांप निकालते है। उसके बाद जुलूस निकाला जाता है। नागपंचमी पर गांव स्थित विषहर स्थानों पर श्रद्धालु महिलाएं पूजा अर्चना कर अपने परिवार के अक्षय आयू एवं अकाल मृत्यु से अभय दान की मंगल कामना करती है।
इसी क्रम में वारिसनगर प्रखंड के रामपुर विशुन में श्री श्री 108 नागपंचमी कमिटी द्वारा नागपंचमी उत्सव बेहद हर्ष व उल्लास के साथ मनाया गया। इस दौरान श्रद्धालुओं व भक्तों द्वारा नागों की पूजा अर्चना की गई।
इस अवसर पर मौजूद राजद अति पिछड़ा प्रकोष्ठ के प्रदेश महासचिव चंदन सहनी ने कहा कि नाग की पूजा के पीछे ये भी एक संदेश छुपा है कि बुरे और कड़वा बोलने वाले लोग भी हमारे सच्चे हितैषी होते हैं। नाग प्राकृतिक सफाई कर्मी और किसानों के सच्चे मित्र भी है। वे विभिन्न प्रकार के कीड़े मकोड़ों को खा जाते हैं. जिससे किसानों की फसलों और लोगों की रक्षा होती है, और पर्यावरण में संतुलन बैठता है।
नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा करने से भय, रोग और अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलती है। इस बाबत एक कथा के अनुसार, राजा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय ने नागों से बदला लेने के लिए एक यज्ञ किया था। इस यज्ञ में सभी नाग जलने लगे, तब ऋषि आस्तिक ने यज्ञ को रोककर नागों की रक्षा की। उस दिन पंचमी तिथि थी, जिसे नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है।