
ओइनी न्यूज नेटवर्क।
समस्तीपुर । चाहे सत्ता कितना भी निरंकुश क्यों न हो, जनकवि नागार्जुन हमें जन सारोकार से जुड़े सवालों को सत्ता के आंखों में आंख डाल कर पूछने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने इंदिरा गांधी के इमरजेंसी के खिलाफ खुलकर लिखा। आज तो लिखने, बोलने यहां तक कि सवाल करने पर भी पाबंदी है। माहौल ऐसा है कि यदि आज नागार्जुन होते तो या तो उनकी हत्या कर दी जाती या जेल में बंद होते।
जनकवि नागार्जुन के 114वीं जयन्ती के अवसर पर आयोजित नागार्जुन के साहित्य की प्रासंगिकता विषयक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए समस्तीपुर काॅलेज समस्तीपुर के पुर्व अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डाॅ प्रभात कुमार ने अपने संबोधन में उक्त बातें कही।
उन्होंने कहा कि चुनाव कभी भी क्रांति का आधार नहीं होता। चुनाव लड़ने वाले दल चुनाव के दौरान बात क्रांति की करते हैं मगर चुनाव में व्याप्त चालाकियों के शिकार हो जाते हैं। वे चुनाव जीतने केलिए जाति-धर्म आदि विघटनकारी तत्वों का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने नागार्जुन का तुलना कबीर, विद्यापति जैसे कवि से करते हुए कहा कि जनकवि नागार्जुन को हिंदी साहित्य में जो स्थान मिलना चाहिए, वह नहीं मिल सका।
बताते चलें कि बुधवार को जन संस्कृति मंच (जसम) जिला कमिटी के बैनर तले सुविख्यात जनकवि नागार्जुन की 114वीं जयन्ती समारोहपूर्वक मनाई गई। इस अवसर पर नागार्जुन के साहित्य की प्रासंगिकता विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
सर्वप्रथम अतिथियों द्वारा उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण कर नागार्जुन जन्म दिवस समारोह सह संगोष्ठी का शुभारंभ किया गया। संगोष्ठी का संचालन जसम के जिला सह सचिव अरविंद आनंद ने किया। जनवादी लेखक संघ के जिलाध्यक्ष शाह जफर इमाम ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि जनकवि नागार्जुन हमेशा संघर्षशील ताकतों के लिए प्रेरणास्रोत बनें रहेंगे।
इस दौरान जलेस के काशीम सबा ने अपने स्व रचित गजल का पाठ किया। मौके पर विद्यानंद दास, सुनील कुमार दूबे, महावीर पोद्दार, ललन कुमार, रामबली सिंह, आइसा के सुनील कुमार, सुरेंद्र प्रसाद सिंह, भाकपा माले जिला सचिव उमेश कुमार, राज्य कमिटी सदस्य बंदना सिंह आदि ने भी संगोष्ठी को संबोधित किया।