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Home » 10 इंच जमीन के लिए बह रहा खून : प्रशासन की नाकामी या सिस्टम की मौत?

10 इंच जमीन के लिए बह रहा खून : प्रशासन की नाकामी या सिस्टम की मौत?

पंचायत में निपटने वाले मामलों में दिख रहा खूनी संघर्ष
Dr. Sanjay KumarBy Dr. Sanjay Kumar17/04/2026Updated:17/04/2026No Comments3 Mins Read
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ओईनी न्यूज नेटवर्क।

Oini 24 समस्तीपुर।  जिले में अब जमीन विवाद सिर्फ विवाद नहीं रहा, यह खुलेआम मौत का खेल बन चुका है। छोटी-मोटी कहासुनी और झड़प, जो कभी पंचायत या बातचीत से सुलझ जाती थी, आज सीधे लाठी-डंडे और हत्या तक पहुंच रही है। सवाल यह है कि आखिर प्रशासन कर क्या रहा है?

लंबित “न्याय” बन रहा हिंसक झड़प :

हर सप्ताह जनता दरबार लगते हैं। कागजों पर समाधान की लंबी-लंबी बातें होती हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि, लोग न्याय के लिए अंचल और थाना के बीच भटक कर थक चुके हैं। नतीजा अब वे खुद “न्याय” करने पर उतर आए हैं। और यही लंबित “न्याय” अब हिंसक झड़प में बदल रहा है।

रास्ता विवाद में बुजुर्ग की हत्या :

सबसे ताजा मामला कर्पूरीग्राम का है, जहां 83 वर्षीय बुजुर्ग रामचंद्र सिंह को सिर्फ रास्ते के विवाद में पीट-पीटकर मार डाला गया। क्या यही कानून का राज है? क्या एक बुजुर्ग की जान की कोई कीमत नहीं?

और भी हैं मामले : 

हलई में 10 इंच जमीन के लिए 72 साल के सुरेंद्र सहनी की हत्या हो जाती है।

दलसिंहसराय में एक महिला तरुन्नुम बेगम की जान चली जाती है।

बिथान में मो. रज्जाक को मार दिया जाता है।

पुलिस ससमय हस्तक्षेप करती तो अलग होता दृश्य :

हर घटना एक ही कहानी कहती है। प्रशासन सो रहा है और लोग मर रहे हैं। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इन हत्याओं के पीछे कोई बड़ी साजिश नहीं, बल्कि मामूली विवाद हैं। यानी अगर समय रहते पुलिस पीड़ित की शिकायत सुनती, मामले में हस्तक्षेप करती, तो दृश्य अलग हो सकता था।

सिस्टम हो चुका पकड़ से बाहर :

जिले के एसपी अरविंद प्रताप सिंह को भूमि मामलों की अच्छी समझ रखने वाला अधिकारी माना जाता है। लेकिन सवाल यह है कि जब समझ है, तो जमीन पर असर क्यों नहीं दिख रहा? क्या सिस्टम उनकी पकड़ से बाहर हो चुका है, या फिर नीचे का तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय हो गया है?

पीड़ित अंचल व पुलिस केलिए अवसर :

सरकार ने भी निर्देश दिए—अंचल और थाना मिलकर काम करें, हर शनिवार बैठक हो, संयुक्त निरीक्षण हो। लेकिन ये सारे आदेश फाइलों में ही दम तोड़ रहे हैं। जमीनी स्तर पर न तो अंचल अधिकारी पहुंच रहे हैं, न थानाध्यक्ष गंभीर हैं। पीड़ित तो इनके लिए अवसर है।

दो पाटों के। बीच पिस रहा आदमी : 

असल समस्या यही है — जिम्मेदारी किसी की तय नहीं है। अंचल कहता है पुलिस देखे, पुलिस कहती है अंचल देखे। अंचल–पुलिस के इस दो पाटों के बीच आम आदमी पिस रहा है।

शासन की विश्वसनीयता पर सवाल :

यह सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल है। अगर एक राज्य अपने नागरिकों को जमीन जैसे बुनियादी विवाद में भी सुरक्षा नहीं दे सकता, तो फिर वह किस बात का शासन है?

तय हो जिम्मेदारी : 

अब वक्त आ गया है कि दिखावे के जनता दरबार बंद हों और जमीन पर कड़ी कार्रवाई शुरू हो। थानों को जवाबदेह बनाया जाए। अंचल अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हो। और सबसे जरूरी पहली शिकायत पर ही सख्त हस्तक्षेप हो। वरना वो दिन दूर नहीं, जब जमीन का हर छोटा टुकड़ा एक संभावित “मौत का मैदान” बन जाएगा।

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Bumi Sudhar Ewan Vanijy DDC Samastipur IPRD Samastipur Land Dispute
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