
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
संजय कुमार झा।
मधुबनी/रहिका। मैथिल ब्राह्मणो का सुप्रसिद्ध सौराठ सभा की शुरुआत हो गयी है। 28 मई से 06 जून तक चलने वाली यह सौराठ सभा या फिर कहें मैथिल ब्राह्मणों का एकलौता ऑफ लाइन मेट्रोमोनियल साइट, आज अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है।
भौतिकता वादी इस युग में आज भले ही विवाह विभिन्न बेबसाइटों के माध्यम से हो रहे हैं। परन्तु सन् 1310 ईस्वी में जब इंटरनेट, सोशल मीडिया और मेट्रोमोनियल साइट नहीं थे, ऐसे में बेबसाइट की जगह पुरे मिथलांचल में 14 जगहों पर मैथिल ब्राह्मणों के द्वारा सभा लगाया जाता था।इस सभा को हम ऑफ लाइन मेट्रोमोनियल साइट्स कह सकते है। हालांकि सभा का प्रारंभिक उदेश्य शिक्षा और शिक्षा की गुणवत्ता के आधार पर उपाधि व तदनुरूप प्रशस्ति/सम्मान पत्र देना था।
इस केलिए सभा वास के दौरान युवाओं को तय विषय पर शास्त्रार्थ करना पड़ता था। शास्त्रार्थ के आधार पर उनकी योग्यता निर्धारित होते थे। शास्त्रार्थ (जिसे आज हम डिबेट कहते है) में निर्णय लेने केलिए विद्वानों का एक मंडल होता था। जिनके निर्णय के आलोक में प्रतिभागियों को पंडित उपाध्याय, महोपाध्याय, महामहोपाध्याय आदी विभिन्न प्रकार की उपाधियां प्रदान की जाती थी।
कहते है सर्वप्रथम इन्ही उपाधि प्राप्त विद्वानों का विवाह सौराठ सभा में तय किया जाता था। जिसके बाद यह प्रथा काफी प्रचलित हो गयी। इसकी ख्याति का अंदाजा इसी बात से लगा सकते है की यहाँ एक से डेढ़ लाख तक मैथिल ब्राह्मण एकत्रित होते थे। सभा में उपस्थित लोगों के संख्या की गवाही यहाँ मौजूद एक विशाल पाकर का पेड़ है। जिसके बारे मे प्रचलित है कि सभा में सवा लाख ब्राह्मणो की उपस्थिति के उपरांत यह वृक्ष कुम्हला जाता था इसके सभी पत्ते गिर जाते थे।
एक अन्य मान्यता के अनुसार सौराठ में सभा की शुरुआत करने का श्रेय राजा छत्र सिंह को दिया जाता है। राजा छत्र सिंह 1807 से 1839 तक मिथिला के राजा रहे। छत्र सिंह को होस्टिंग्स ने नेपाल के साथ हुए युद्ध में सहायता करने पर महाराजा की उपाधि दी थी। कहा जाता है की सौराठ में सभा की शुरुआत से पहले यह सभा समौल गांव में लगता था। इस सभा के मुख्य विद्वान पंडित धारे झा हुआ करते थे। पंडित धारे झा का ग्रामीणों के साथ किसी बात को लेकर अनबन हो गया जिसके बाद तत्कालीन बड़े तांत्रिक होरिल गोसाई के सहयोग से इस सभा की स्थापना सौराठ में की गयी। उस वक्त सौराठ गांव को लोग गंगापट्टी और भगीरथपट्टी के नाम से जानते थे।
तब तक सौराठ सभा में पंजीप्रथा की व्यवस्था शुरु हो चुकी थी और इसी कारण से यहाँ तय किये गए विवाह के पंजीयन की एक प्रति उपलब्ध करने की परंपरा रखी गयी थी। पंजीकार बनने के लिए धौत उपाधि अनिवार्य थी। जिस केलिए दस वर्षीय पाठ्यक्रम की पढ़ाई होती थी। धौत उपाधि प्राप्त होने पर दरभंगा महाराज उनको सम्मानित करते थे और उन्हें पंजीकार के रूप में ख्याति हासिल हो जाती थी।
सभा स्थली पर बायोडाटा के जगह पर लड़के को स्वयं उपस्थित होकर अपने बारे में बताना होता था। लड़की वाले की संतुष्टि के उपरांत विवाह की शेष प्रक्रिया की जाती थी । इस विवाह पद्धति में ठगी की संभावना नगण्य होती थी।
परन्तु आज परिस्थिति कूछ और है। सरकारी संरक्षण के अभाव और लोगों की उदासीनता का शिकार पंजीयन करने वाले पंजीकार सिमटते जा रहे है फलत: सौराठ सभा भी अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है।
विवाह पंजीयन के दौरान अपने दर्जनों पीढ़ियों के बारे में जानने का मौक़ा मिलता है। सौराठ सभा को आज जरुरत है एक जिर्णोद्वारक की जो मिथिलांचल की सभ्यता और संस्कृति को सहेजने वाले इस सभा को पुनः जीवित कर सके।