
जाने कहां से कहां आ गये हम – सांस्कृतिक विरासत – 01
संकलन व संपादन – डाॅ संजय कुमार राजा
खान-पान, रहन-सहन, भाषा, परिधान, संस्कृति और परंपरा के लिहाज से दुनिया भर में प्रसिद्ध मिथिला की मौलिक चीजें नयी पीढी केलिए बेमानी, पिछडेपन की निशानी, लगने लगी हैं। दही-माछ-पान-मखान-मिष्ठान्न के लिये प्रसिद्ध मिथिला की सांस्कृतिक राजधानी मधुबनी में आज भी मिथिला की विशाल एवं समृद्ध सांस्कृतिक धरोहरों व परम्पराओं के अवशेष उपलब्ध हैं। इन्हीं सांस्कृतिक धरोहरों में एक है सौराठ सभा गाछी और सभा वास की परंपरा।
आज जब एक बार फिर सौराठ में सभा वास का शुभारंभ हो रहा है ऐसे में अपनी सांस्कृतिक विरासतों, धरोहरों, व परंपराओं से दूर जा रही 21वीं सदी की पीढी केलिए यह आलेख समर्पित है।
हम बात कर रहे हैं मिथिला में विवाह परंपरा की अनमोल धरोहर, करीब 700 साल पुराने सभा गाछी और सभा वास के परंपरा की।
बिहार के मिथिलांचल में वर्तमान मधुबनी जिले में मधुबनी से लगभग 6 किमी उत्तर पूर्व में रहिका प्रखंड स्थित सौराठ एक गांव है। जहां गुजरात के सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर मारू-गुर्जर शैली में बने सोमेश्वर नाथ महादेव मंदिर, विशाल पोखर, कुआं, व मंदिर से सजा एक विशाल उपवन है, जिसे सभा गाछी कहते हैं।
कहा जाता है कि, बारहवीं सदी में मुगल आक्रांताओं से बचते बचाते गुजरात के सौराष्ट्र से दो ब्राह्मण यहां आकर बस गये थे। चुंकि वे लोग सौराष्ट्र से आकर यहां बसे थे इसलिए बाद में इस जगह का नाम सौराठ पड़ गया।
यहां चौदहवीं शताब्दि से प्रतिवर्ष ज्येष्ठ-आषाढ में वर-वधु चयन हेतु मैथिल ब्राह्मणों की सभा का भव्य आयोजन होता रहा है, इसलिए इस उपवन को सभा गाछी और सौराठ में अवस्थित होने के कारण यहां आयोजित सभा को सौराठ सभा कहा जाने लगा।
यहां एक विशाल पेड़ है जिसके बारे में कहा जाता है कि पेड के सारे पत्तों के झड़ कर गिरने के साथ सभा वास समाप्त होता था। सभा खत्म होने के बाद मिथिला पंचांग के अनुसार विवाह के शुभ मुहूर्त भी समाप्त हो जाते हैं।
सौराठ सभा की परंपरा स्वयंवर से थोड़ी मिलती है। स्वयंवर की तरह विवाह योग्य युवक वर रूप में अपने परिजनों के साथ उस विशाल वृक्ष की छांव में जमीन पर दरी बिछा कर बैठते हैं और वधु पक्ष के लोग घूम घूम कर पहले योग्य परिवार व वर चुनते हैं। आपसी बातचीत के बाद परस्पर सहमति से वर का वरण करने के बाद पांजिकार की अनुमति से विवाह के रस्म की ओर कदम बढाते थे।
इतिहासवेत्ताओं के अनुसार सौराठ सभा की शुरुआत लगभग 1310 ईस्वी में हुई मानी जाती है। जिसे मिथिला क्षेत्र में कर्णाट वंश के शासक राजा हरिसिंह देव द्वारा शुरू करायी गई थी। दंत कथाओं की मानें तो इस स्थान और परंपरा को जीवन्तता देने केलिए तत्कालीन दरभंगा महाराज ने यहां आकर अपनी बहन केलिए वर चयन किया था।
इस सभा का मुख्य उद्देश्य अंतरजातीय और समगौत्री विवाह को सामाजिक और वैज्ञानिक कारणों से निषिद्ध मानते हुए विवाह योग्य बच्चों के माता-पिता को परेशानी से बचाना था। महर्षि मतंग, मंडन मिश्र, कवि कोकिल विद्यापति, अयाची मिश्र जैसे कई महान व्यक्तित्व का नाम इस स्थान से जुड़ा है। जो इस स्थान के स्वर्णिम गौरवशाली अतीत की गवाही देता है।
यहां यह बताना आवश्यक है कि वर चुनाव से पहले सौराठ सभा गाछी में उपस्थित लोगों के बीच विविध प्रकार की विशद चर्चा होती थी। चर्चा का केन्द्र मुख्य रूप से वर-वधु के शील-गुण, कुल, मूल और पाँजिका होता है। जिनके जितने बड़े कुल-मूल-पाँजि होते हैं उनको उतना ही अधिक सम्मान मिलता है और उनकी पूछ उतनी ही अधिक होती है। पांजी की प्रक्रिया के बाद जन्म पत्री मिलान होता था। वर के योग्यता की परख केलिए शास्त्रार्थ होते थे।
इस संबंध में पूछे जाने पर रहिका प्रखंड के बनौली निवासी चिरंजीव झा के पुत्र मुकेश झा बताते हैं कि आज के दौर में जब, समाज खास कर युवा पीढी पर सिनेमा और टीवी का जादू सिर चढ कर बोल रहा है, उनका रहन सहन, पहनावा सब सोशल मीडिया और आधुनिकता के चमक-दमक से प्रभावित हैं, ऐसे में कुल-मूल-पाँजि, शील-गुण जैसी सांस्कृतिक व पारंपरिक बातें अप्रासंगिक प्रतीत होने लगे हैं। वर का व्यक्तिगत गुण, आचरण और रोजगार, संपत्ति, आदि अनिवार्य वैवाहिक योग्यता बनता जा रहा है। यह सबसे बड़ा कारण है कि यातायात के बढते साधन के साथ सभा गाछी आने वाले लोग घटते गये।
जब यातायात के साधन सीमित थे तो यहां जुटने वाले लोगों की संख्या लाखों में होती थी। आज जब यातायात के पर्याप्त साधन मौजूद हैं तो सभा गाछी में पिछले वर्ष 2024में कुछ सौ लोग आये थे। विदित हो कि पहले गुरुकुल से विवाह योग्य युवकों को सौराठ सभागाछी में लाया जाता था और यहीं से उनका ब्रह्मचर्य जीवन से गृहस्थ जीवन में प्रवेश कराया जाता था विविध गुरुकुलों से पधारे उन योग्य शिक्षित युवकों की प्रतिभा को जाँच-परख कर लोग अपने स्वजनों के लायक उचित वर समझकर गुरुजनों से आज्ञा लेते थे। यहीं से उनका ब्रह्मचर्य जीवन से गृहस्थ जीवन में प्रवेश कराया जाता था।
विवाह कराने से पूर्व लड़कों के पैतृक परिवार के सात पुश्तों में और मातृक परिवार के पाँच पुश्तों में कभी सीधा रक्त सम्बन्ध नहीं पाये जाने पर अधिकार निर्णय करवाते थे। ऐसे अधिकार निर्णय को एक तार के पत्ते पर मिथिलाक्षर में लाल स्याही से लिखवाया जाता था जिसे ‘सिद्धान्त’ कहा जाता है। आज से करीब चालिस – पैंतालिस साल पहले तक सिद्धांत विवाह का अनिवार्य अंग माना जाता था।
(सिद्धांत व पंजी व्यवस्था पर अगले अंक में चर्चा करेंगे)
पुरी दुनिया में मैथिलों की यह वैवाहिक परंपरा वैज्ञानिक और सामाजिक रूप से सर्वोत्तम मानी जाती है। विवाह अधिकार निर्णय की इस अनूठी रीति को बाद में विभिन्न वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों ने अपने-अपने ढंग से तर्क और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर सर्वप्रथम श्रेष्ठ करार दिया है।
(सशेष)