
ओईनी न्यूज नेटवर्क
संजय कुमार झा।
मधुबनी/रहिका। सौराठ सभावास के विगत चार दिनो में एक दर्जन से अधिक संख्या में वर एवं कन्या जोड़ों के नाम पंजी में दर्ज किया गया है। पंजीकारों ने बताया कि आगामी विवाह लगन तिथि पर शुभ मुहूर्त में पंजी में दर्ज वर एवं कन्या जोड़े परिणय सूत्र में बंध जाएंगे।
पंजीकारों ने बताया कि जून माह में दो ही विवाह लगन तिथि पंचांग में दिया गया है। इसलिए समय कम होने के कारण कई लोग आगामी नवंबर माह के लग्न में विवाह कार्यक्रम आयोजित कर सकते है। इसलिए भी पंजीकारों का काम सालोंभर चलता ही रहता है।
वर्तमान में सरकारी काम-काज के निबंधन कार्यालय में रजिस्टार होते हैं। जन्म मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने वाले को भी रजिस्ट्रार ही कहा जाता है। विवाह का पंजीयन भी रजिस्ट्रार करते हैं। लेकिन इन पुरातन कालीन पंजीयन पद्धति में विवाह संबंध के नाम दर्ज कर अभिलेख रखने वाले को पंजीकार कहा जाता है। रजिस्ट्रार के वैवाहिक अभिलेख कई तुलना में पंजीकारों के अभिलेख या कहें पंजी अपेक्षाकृत अधिक गहराई वाले, तथा विश्वसनीय होते हैं।
सौराठ सभा गाछी में सभा वास में पंजीकार प्रमोद मिश्र पंजी कार्यालय हरेक साल अस्थाई तौर पर खोलते हैं। उन्होंने बताया कि पहले चार पंजी सिद्धांत लिखने के लिए अस्थाई पंजी कार्यालय सभा वास के प्रारंभ से समापन तिथि तक चलता था।
उन्होंने बताया कि अभिलेखों से भरे हुए बक्सा को कच्चे अस्थाई घर में रखने में कठिनाई होती है।वर एवं कन्या जोड़े के दोनों वंशजों का सैकड़ों साल पुराना उतेढ़ इन्हीं अभिलेखों से विवाह अधिकार देखा जाता है।वर एवं कन्या पक्ष के पितृपक्ष के सात पीढ़ी एवं मातृ पक्ष के पांच पीढ़ियों के उतेढ़ देखकर रक्त संबंध का गहनता से जांच किया जाता है।
विवाह पंजी वंशावली बनाने से पूर्व सबसे पहले वर एवं कन्या पक्ष का गोत्र एक समान नहीं होना चाहिए। पंजीकार कहते हैं कि वर एवं कन्या पक्ष के लोग समगोत्री की जांच स्वयं करते हैं। विवाह संबंध तय होने में घटक की भूमिका समगोत्र जांच कर बिषम गोत्र के वर एवं कन्या जोड़े का जांच करते हैं। समगोत्री नहीं होने पर पितृपक्ष एवं मातृ पक्ष के अभिलेखों में वंशावली वृक्ष के उतेढ़ देखकर वर एवं कन्या पक्ष को विवाह अधिकार होने की सम्पूर्ण जानकारी दिया जाता है।
वर्तमान समय में कुल,पांजि एवं मूल ग्राम के बारे में गहनता से विचार कम किया जाता है। लेकिन चार दशक पूर्व गोत्र मूल ग्राम एवं पांजि देखकर ही विवाह संबंध का विचार करते थे। मूल ग्राम स्थान बढ़ियां नही होने पर पांजि एवं कुल पांजि पितृपक्ष एवं मातृ पक्ष का बेहतर होने पर ही विवाह संबंध तय किया जाता था।
सभा को लेकर वर्तमान में लोगों के विचार में व्यापक परिवर्तन हुआ है। सभा के इस बदहाली की कहानी के बारे में संजय झा बताते हैं कि पंजीकार और सभावास में चोली दामन का साथ है। दरभंगा राज के पतन के साथ ही पंजीकारों की बदहाली के साथ-साथ ही सौराठ सभा के बदहाली की पटकथा तैयार हो गयी थी। श्री झा ने बताया कि प्रजातंत्र के अस्तित्व में आने व पल्लवित-पुष्पित होने के साथ पंजीकारों की उपेक्षा की जाने लगी, जिससे इस कार्य के प्रति उनमें अरुचि दिखने लगी। क्योंकि राजकोष से मिलने वाली आर्थिक सहायता बंद हो गयी थी। उपर से साम्यवाद के उद्भव के साथ आदर्श विवाह के नाटक से लोगों की पंजीकार और सभा से दूरी बढी। जब कम्प्यूटर और गूगल ने बाजार में कदम रखा तो रहा सहा कसर सोशल मीडिया और विभिन्न मेट्रोमोनियल साइट ने पूरा कर दिया।
आज आलम यह है कि पांच दिन गुजरने के बाद भी पंजी लिखाने वालों की संख्या 100 तक नहीं पहुंची है।