
जाने कहां से कहां आ गये हम – 02
संकलन व संपादन- डाॅ संजय कुमार राजा
सहयोग : विजय कुमार झा/संजय कुमार झा
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
(गतांक से आगे)
मधुबनी। पिछले अंक में हमने मिथिला की सात सौ साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत मधुबनी जिले के रहिका प्रखंड स्थित सौराठ सभा के वैभवशाली अतीत में झांकने की कोशिश की थी। ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा दिन मंगलवार को सभा वास का विधिवत शुभारंभ हो गया है। आज हम सौराठ स्थत सभा के प्रति आकर्षण में ह्रास और पंजी व्यवस्था पर चर्चा करेंगे।



चौदहवीं शताब्दि में कर्णाट वंश के न्याय प्रिय, प्रजा पालक राजा हरिसिंह देव ने सुलभ एवं सहज विवाह सुनिश्चिति करने केलिए सभा वास की व्यवस्था शुरु की थी। सभा कई एकड में फैला एक ऐसा स्थान जहां विवाह योग्य युवक गुरुजन व परिजन के साथ एकत्र होते थे और कन्या पक्ष के लोग अच्छी तरह देख परख कर इच्छित वर का चुनाव कर अपनी पुत्री के विवाह की प्रक्रिया आगे बढाते थे।
राजा हरिसिंह देव ने 14 स्थानों पर इस तरह की शुरुआत की थी। जिसमें सौराठ, खानागढी, परतापुर, शिवहर, ससौला, बलुआ, फतेपुर, गोविंदपुर, सुखासन, अखड़ी, हेमनगर, समसौल, बरुआली एवं साझोल में सभा का आयोजन होता था। इन गांवों में मैथिल ब्राह्मणों की सभा लगती थी।
उन दिनों कायस्थ समाज के लोगों केलिए सभा का आयोजन गांवों में होता था। कालान्तर में धीरे-धीरे वैवाहिक सभा स्थलों की संख्या कम हो गई। पांच दशक पूर्व तक सीतामढ़ी जिले के ससोला में भी सभा लगता था। वर्तमान में मिथिला क्षेत्र में केवल सौराठ में ही सभा वास होता है तथा इस क्षेत्र में आज भी पंजी सिद्धांत व्यवस्था कायम है।
यहां वर वधु का पूर्ण परिचय लाल स्याही से सूखे ताड़ पत्र पर लिखा जाता था। जिसे सिद्धांत कहते थे। सिद्धांत आज की शब्दावली में विवाह के पंजीयन का प्रमाण पत्र हुआ करता था। सिद्धांत लिखने वाले पंजीकार कहे जाते थे। उनके पास एक पंजी होती थी जिसमें पीढी दर पीढी के लोगों का पुर्ण विवरण होता था। वे अंतिम रुप से सिद्धांत लिखने के पुर्व यह सुनिश्चित करते थे कि वर पक्ष के सात एवं कन्या पक्ष के पांच पुश्तों में कोई संबंध नहीं हो। गंगा तट पर कल्पवास की तर्ज पर इस ग्यारह दिवसीय सभावास के दौरान सभा स्थल पर एवं आसपास के क्षेत्र में हर्षोल्लास और उत्साह से सराबोर मेला जैसा माहौल होता था।
गुजरते वक्त के साथ बदलती मानसिकता के कारण सभा को लेकर लोगों का आकर्षण कम होता गया। बदलते सामाजिक परिवेश और मानसिकता ने इसकी उपयोगिता पर ही सवाल खड़ा कर दिया। इसी क्रम में बेबुनियाद एक भ्रान्ती ने लोगों के मन मस्तिष्क में घर कर लिया कि, जिनका किसी ऐब (कमी/दुर्गुण) के कारण विवाह नहीं होता है वे लोग ही सभा वास में जाते हैं।
जिससे साधन संपन्न लोगों का यहां आना कम से कमतर होता गया। करीब तीन दसक पुर्व तक दूर दराज से लोग सिर्फ सिद्धांत लिखवाने सौराठ आदि इलाकों में पंजीकार के पास आते रहे थे। समय के साथ यह प्रथा भी कम हो गई।
राजा महाराजा के दौर में पंजीकारों को राज्याश्रय प्राप्त हुआ करता था। राजा की ओर से उनकी आर्थिक सहायता की जाती थी, जिससे पंजी व्यवस्था सुदृढ़ थी। वर्तमान में तो वर एवं कन्या पक्ष के लोग विवाह तय करने के बाद वैवाहिक पंजी व सिद्धांत लिखवाते हैं तो खुशी से कुछ दक्षिणा आर्थिक मदद के रूप में देते हैं।
पुरोहित्य और पंजीकारी पेशे में आय कम होने से नयी पीढी में उत्पन्न इस पेशे के प्रति विकर्षण के कारण पंजीकारों की आबादी कम होती गयी। उपर से सोशल मीडिया के चलन और विभिन्न वैवाहिक साईटों के अस्तीत्व में प्रादुर्भाव और पल्लवित पुष्पित व फलित होने से सभा और सिद्धांत का आकर्षण और औचित्य दोनों बुरी तरह प्रभावित हुआ।
इस बाबत पूछे जाने पर पंजीकार प्रमोद मिश्र ने बताया कि वर्तमान में करीब एक दर्जन से अधिक पंजीकार विभिन्न जगहों पर वैवाहिक पंजी बनाते हैं। उन्होंने बताया कि सौराठ एवं पोखरौनी में विनोद नारायण झा, कन्हैया मिश्र, विश्व मोहन मिश्र, ककरौल गांव में बटुक झा, जरैल में रमण झा, बेहटा में गोविंद मिश्र, शिवनगर में कृष्णानंद झा, ननौर में प्रो.दयानंद मिश्र, दरभंगा जिला के चकौती गांव में भवेश झा, के अलावा सीतामढ़ी जिले में ढेंग स्टेशन के समीप सझुआर तथा पड़ोसी देश नेपाल के बनौली में सालों भर वैवाहिक पंजी सिद्धांत पंजीकार तार के सूखे पत्ते पर लिखते हैं।
वर एवं कन्या पक्ष के लोग परस्पर बातचीत कर विवाह तय कर लेते हैं तब वैवाहिक कार्यक्रम की तिथि निर्धारित होने से पूर्व वर एवं कन्या का वैवाहिक पंजी में नाम दर्ज कराते हैं और इस तरह उनकी वंशावली बन जाती है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में जितने भी पंजीकार साल भर में वैवाहिक पंजी व सिद्धांत लिखते हैं वे सभी एक दूसरे पंजीकार से नयी जानकारी साझा कर अपनी अपनी पंजी को अद्यतन कर लेते हैं।
पंजीकारों ने बताया कि दुनिया में लाखों परिवारों का सात सौ वर्षों की वंशावली वृक्ष केवल मिथिला के मैथिल ब्राह्मणों एवं कायस्थों का मिल जाता है। लेकिन इस पुरातन वैवाहिक वंशावली पंजी व्यवस्था का संरक्षण सरकार नही कर रही है। जिसके कारण पंजीकारों का यह पंजी सिद्धांत का रोजगार के प्रति आकर्षण घट गया है।
फिर भी अपनी सांस्कृति और परंपरा से जुड़ी युवा पीढ़ी का एक वर्ग ऐसा है जिनकी, अपनी परंपरा को बचाए रखने की इच्छा व प्रतिबद्धता ने उम्मीद की लौ जगा रखी है। मिथिला की पहचान, और परंपरा, को बचाए रखने की कोशिश भी हो रही है। कई सामाजिक संगठन इसमें लगे हुए हैं।
समय के साथ चलते हुए पंजी को कंप्यूटरीकृत करने का प्रयास किया जा रहा है। इससे मिथिला के लोगों को वंशावली के बारे में ऑनलाइन जानकारी मिल सकेगी। कुल-खानदान के बारे में जानकारी जुटाने में सहूलियत होगी। संस्कृति प्रेमी युवाओं के निरंतर व मैराथन प्रयास के बाद विगत कुछ समय से सरकार के स्तर पर भी सौराठ सभा की गरिमा को बनाए रखने की कोशिश की जाने लगी है।
मधुबनी जिले की कला संस्कृति पदाधिकारी ने मिथिला की सांस्कृतिक पहचान कए संरक्षण व संवर्धन की दिशा में कई अभिनव व नवाचारी प्रयोग किये हैं। प्रभारी मंत्री लेसी सिंह ने पिछले दिनों जिले की यात्रा के दौरान कहा था कि मैथिल ब्राह्मणों के विश्व प्रसिद्ध वैवाहिक निर्धारण स्थल सौराठ सभा के विकास की पहल की जाएगी। इसे पर्यटन स्थल का दर्जा दिलाने और सौराठ सभा को सौराठ राजकीय महोत्सव के रुप में मनाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। वहीं मधुबनी से ही आने वाले राज्य के पीएचईडी मंत्री रामप्रीत पासवान ने भी सभा की विरासत को बचाने केलिए पंजी के कम्प्यूटरीकरण को आवश्यक माना है। उन्होंने भी सौराठ सभा को राजकीय महोत्सव का दर्जा दिलाने के लिए हर संभव मदद करने की बात कही थी।, ताकि इस परंपरा को बचाया जा सके। खबर है कि राजकीय महोत्सव के रूप में मनाने की अनुमति मिल गयी है, कुछ औपचारिकतायें शेष हैं। शीघ्र ही राजकीय महोत्सव की औपचारिक घोषणा और विधिवत उद्घाटन किया जायेगा।
सौराठ सभा समिति के अध्यक्ष कृष्ण कान्त झा गुड्डू, सचिव शेखर चन्द्र मिश्र एवं सह सचिव अनिल कुमार झा ने बताया कि इस पंजी सिद्धांत व्यवस्था में जो भी कमी आई है इसे दूर कर इस व्यवस्था को सुदृढ किया जाएगा। सात सौ वर्षों की पंजी व्यवस्था अनंत काल तक चलता रहेगा।