

ओईनी न्यूज नेटवर्क।
ओईनी। वैश्वीकरण की होड़ में आधुनिक बनने के चक्कर में पाश्चात्य सभ्यता का अनुसरण करते करते हम अपनी मूल संस्कृति से इतना दूर निकल आये हैं कि हम अपनी विशाल और अप्रतिम सांस्कृतिक विरासत को भूलते जा रहे हैं। आलम यह है कि नयी पीढ़ी को हमारी सांस्कृतिक खूबसूरती का लेश मात्र भी अहसास नहीं रह गया।
आधुनिक बनने, दिखने और कहलाने की व्यर्थ कोशिश में हम जो चीजें भूलने लगे हैं या कहें जो चीजें छूट रही हैं उनमें से ही एक है विवाह गीत। जब घर की महिलायें स्वागत, से लेकर परिजन, सिन्दुर दान, सौजन, कोहबर आदि गीत गाती थीं तो विवाह के खुशनुमा माहौल पर मादकता पूर्ण आसीम आनन्द का रंग चढ जाता था। इस क्रम में गयी जाने वाली गारी का भी एक खास अंदाज वर और वधु पक्ष में अद्भुत अलौकिक आनन्द का संचार कर देता था जिससे विवाह से जुड़ा हर रस्म आनन्ददायक हो जाता था।
शारदा अनिल सावित्री संगीत महाविद्यालय के तत्वावधान में और महाविद्यालय के संस्थापक डाॅ सुनील कुमार सिंह के निर्देशन में सावित्री स्नेहलता रंगमंच की ओर से इन्ही विवाह गीतों पर आधारित सात दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सबसे पहले आयोजक डाॅ सिंह, शिक्षाविद अरुण कुमार सिंह, व मुख्य प्रशिक्षक कृष्ण कुमार कन्हैया के साथ क्षेत्र के जाने माने तबला वादक सुरेश ठाकुर, चंद्रभूषण मिश्र आदि ने करतल ध्वनि एवं दीप मंत्रोच्चार के बीच संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यशाला का विधिवत उद्घाटन किया।
तदुपरान्त अपने संबोधन में विषय प्रवेश कराते हुए डाॅ सुनील कुमार सिंह ने कहा कि, हमारे सांस्कृतिक विरासत विविध संस्कारो व उनसे जुड़े रस्मों का श्रृंगार हैं विवाह गीत सहित अन्य संस्कार गीत।
उन्होंने कहा कि एक दौर था जब हर घर में बेटियों को विवाह आदि सैकड़ों संस्कार गीत कंठस्थ होते थे। घरेलु कार्यों यथा रसोई, सिलाई, कढाई आदि की तरह यह भी उनका अनिवार्य गुण होता था। विडंबना है कि आज बाजारवाद के दौर में ये गीत कुछ खास लोगों में सिमट कर रह गये हैं जिनकी वजह से विवाह गीत जीवित हैं।
उन्होंने कहा कि विवाह गीतों की इस परंपरा को पुनर्स्थापित करने और बेटियों को इसके प्रति जागरूक करने के लिए एक पहल करते हुए हमने सात दिवसीय विवाह गीत कार्यशाला का आयोजन किया है। जिसमें मैथिली संस्कार गीतों के मूर्धन्य गायक कृष्ण कुमार कन्हैया प्रतिभागियों को विवाह के क्रम में प्रत्येक अवसर पर गाये जाने वाले गीतो का महत्व और खूबसूरती से अवगत करायेंगे।
यह कार्यशाला मैथिल कोकिल महाकवि विद्यापति के बाद सबसे अधिक गाये जाने वाले मैथिली गीतों के रचयिता स्नेहलता जी को समर्पित है। इस क्रम में सुविख्यात लोक गायक कन्हैया जी ने इसे एक खूबसूरत एवं एतिहासिक पहल करार देते हुए आभार प्रकट किया और कहा कि मेरे लिए यह गौरवान्वित करने वाला पल है कि अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण व संवर्धन हेतु आयोजित इस कार्यशाला का मैं भी हिस्सा हूं।
इसके पुर्व महाविद्यालय की छात्राओं ने स्नेहलता द्वारा रचित सरस्वती वंदना प्यार दे शारदे’ एवं स्वागत गीत झूमे झूमे ये नज़ारे गाकर अतिथियों का स्वागत किया।
तदुपरांत प्रशिक्षक कन्हैया जी ने स्नेह लता रचित अपना किशोरी के अंगना बिलोकू बहिना, अपना किशोरी जी के टहल बजैबई हम मिथिले में रहबई गाकर कार्यशाला को दिशा दी। कार्यशाला में पहले दिन विवाह के पहले रस्म परीछन गीत’ के बारे में छात्राओं को बताते हुए सिया के होइए राम सजनवा सिखलाया गाया।
तबला पर मनोरंजन झा ने गीतों के भाव सौंदर्य को बढाने में अहम भूमिका निभाई। मौके पर दिलीप कुमार सिंह, प्रभात कुमार तुलसी, रमेश कुमार शर्मा, नंदकिशोर शर्मा आदि मौजूद थे।