
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 समस्तीपुर। हालिया कुछ महीनों में अपने कड़े फैसलों से चर्चा में रहे कुलपति एक बार फिर एक फैसले से चर्चा में हैं। जिस कारण पूसा में आयोजित एग्री विजन 2026 कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही लोगों के बीच छा गया है। क्योंकि इस कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के कुलपति डॉ पी.एस. पाण्डेय करेंगे।
केन्द्रीय शिक्षण संस्थानों की निष्पक्षता :
इस खबर के मिलने के बाद विश्वविद्यालय परिसर में बहस छिड़ गई है। कई शिक्षकों और छात्र संगठनों ने इस निर्णय पर सवाल उठाते हुए इसे शैक्षणिक संस्थानों खास कर केन्द्रीय शिक्षण संस्थानों की निष्पक्षता के विपरीत बताया है।
छात्र संगठनों व राजनीतिक दलों से समान दूरी जरूरी :
इस संदर्भ में भाकपा माले नेता अमित कुमार ने क्षोभ जताते हुए कहा कि, “किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति का किसी एक राजनीतिक दल के छात्र संगठन के कार्यक्रम में औपचारिक रूप से अध्यक्षता करना संस्थान की तटस्थ छवि को प्रभावित कर सकता है। यह कुलपति और विश्वविद्यालय की गरिमा को प्रभावित करने वाला है।”
चौंकाने वाली खबर तो है:
उन्होंने कहा कि, विश्वविद्यालय प्रशासन को सभी छात्र संगठनों व राजनीतिक दलों से समान दूरी बनाए रखनी चाहिए। ताकि किसी प्रकार के पक्षपात का संदेश न जाए। ऐसी परंपरा भी रही है। मौजूदा कुलपति डॉ. पाण्डेय इसके पूर्व किसी राजनीतिक या सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शिरकत करने से बचते दिखे भी हैं। ऐसे में यह खबर चौंकाने वाली तो है ही।
विश्वविद्यालय और कुलपति पद की मर्यादा और छवि होगी धूमिल :
कुछ छात्र नेताओं ने इसे “संस्थागत समर्थन” के रूप में देखते हुए चिंता जताई है कि, इससे कैंपस की लोकतांत्रिक संस्कृति प्रभावित हो सकती है। उनका कहना है कि यदि कुलपति किसी एक संगठन के मंच पर प्रमुख भूमिका निभाते हैं, तो अन्य संगठनों के साथ असमानता की स्थिति बन सकती है। इससे विश्वविद्यालय और कुलपति पद की मर्यादा और छवि धूमिल होगी।
आरोप बेबुनियाद :
हालांकि, विश्वविद्यालय सूत्रों ने इस बाबत पूछे जाने पर बताया कि, यह आरोप बेबुनियाद है। यह कार्यक्रम एबीवीपी का नहीं बल्कि एग्री विजन का है और विश्वविद्यालय एग्री विजन से सीधे जुड़ा है। चूंकि यह कार्यक्रम राजनीतिक नहीं है, इस लिहाज से विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यक्रम में शामिल होना लाजिमी है।
स्पष्ट नीति की आवश्यकता :
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या विश्वविद्यालय प्रशासन को छात्र संगठनों के कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखनी चाहिए, या फिर उन्हें ऐसे मंचों पर सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। विशेषज्ञों व बुद्धिजीवियों का स्पष्ट मानना है कि, इस मुद्दे पर स्पष्ट नीति की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसे विवादों से बचा जा सके।