
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 समस्तीपुर। डॉ. बशीर बद्र के जाने से उर्दू साहित्य के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत हो गया है। इसके साथ ही मर्मस्पर्शी गीतों व गज़लों का एक युग खत्म हो गया। उजियारपुर विधायक एवं पूर्व मंत्री आलोक कुमार मेहता ने उनके निधन पर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए उक्त बातें कही।
आम लोगों के दिलों तक पहुंची उनकी गजलें :
उन्होंने कहा कि बशीर बद्र ने अपनी शायरी में कठिन फारसी शब्दों के बजाय आम बोलचाल की सरल और भावनात्मक भाषा को प्रमुखता दी। जिससे उनकी गजलें सीधे आम लोगों के दिलों तक पहुंचीं।
शोक की लहर :
उर्दू शायरी और गजल की दुनिया के नामचीन शायर, रौनक ए महफिल पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र का 91 वर्ष की आयु में भोपाल स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। इसके साथ ही मुशायरों की महफ़िल का एक और चिराग़ बुझ गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे और डिमेंशिया (स्मृतिलोप) जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर से साहित्य प्रेमियों और उर्दू अदब से जुड़े लोगों में शोक की लहर दौड़ गई।
मिले पद्मश्री सहित कई सम्मान :
डॉ. बशीर बद्र को वर्ष 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें पद्मश्री, बिहार उर्दू अकादमी सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए थे।
उत्पन्न शून्य को भर पाना आसान नहीं :
उनकी रचनाएं आज भी लोगों की जुबान पर हैं। उनका मशहूर शेर “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए” आज भी गीत–संगीत के प्रेमियों को भावुक कर देता है। शोक संतप्त साहित्यकारों ने कहा कि डॉ. बशीर बद्र का योगदान उर्दू शायरी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण रहा है। उनके निधन से उत्पन्न शून्य को भर पाना आसान नहीं होगा।