
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 पूसा। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय परिसर स्थित एडवांस सेंटर ऑफ मशरूम रिसर्च के सभागार में औषधीय मशरूम की खेती एवं मूल्य संवर्धन विषय पर सात दिवसीय प्रशिक्षण का शुभारम्भ हुआ। जिसकी अध्यक्षता निदेशक अनुसंधान डॉ. अनिल कुमार सिंह ने की।
औषधीय मशरूम से किसान हो रहे मालामाल :
अतिथियों के स्वागत सम्मान एवं संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन की औपचारिकता के बाद उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए निदेशक शिक्षा डॉ यूके बेहरा ने कहा कि, औषधीय मशरूम की खेती बिहार के किसानों के लिए संजीवनी बन चुकी है। अब बिहार के किसान परंपरागत खेती से हटकर औषधीय मशरूम उगाकर मालामाल हो रहे हैं।
एक झोपड़ी से सालाना 4-5 लाख रुपए की शुद्ध आमदनी संभव :
कैंसर, शुगर और बीपी जैसी बीमारियों में कारगर माने जाने वाले गैनोडर्मा, शिटाके, कॉर्डिसेप्स और ओयस्टर मशरूम की खेती, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर और पटना के किसानों के लिए, समृद्धि के नए द्वार खोल रही है। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिकों के मुताबिक, 10×10 की एक झोपड़ी से ही सालाना 4-5 लाख रुपए की शुद्ध आमदनी संभव है।
1200 से ज्यादा किसान औषधीय मशरूम से जुड़े :
नंबर वन मशरूम उत्पादक राज्य बिहार में उत्पादन का हाल जानने के लिए राज्य बागवानी निदेशालय के 2025 के आंकड़ों को देखें तो बिहार में कुल मशरूम उत्पादन 38,500 मीट्रिक टन पहुंच गया है। इसमें औषधीय मशरूम की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। पिछले 2 साल में गैनोडर्मा का उत्पादन 120 टन से बढ़कर 310 टन हो गया। समस्तीपुर जिला अकेले 45 टन गैनोडर्मा और 60 टन ओयस्टर मशरूम पैदा कर रहा है। पूसा, कल्याणपुर और वारिसनगर प्रखंड इसके हब बन रहे हैं। वर्तमान में 1200 से ज्यादा किसान औषधीय मशरूम से जुड़े हैं।
बटन की तुलना में औषधीय मशरूम 20 गुना तक ज्यादा महंगा :
मशरूम विशेषज्ञ डॉ. दयाराम ने बताया कि गैनोडर्मा को ‘किंग ऑफ हर्ब्स’ कहा जाता है। इसका बाजार भाव 2500-4000 रूपये प्रति किलो सूखा है। कॉर्डिसेप्स मिलिटेरिस 1 लाख रुपए प्रति किलो तक बिकता है। इसमें एंटी-ट्यूमर, एंटी-डायबिटिक गुण होते हैं। अमेरिका, जापान और चीन में इसकी भारी डिमांड है। सामान्य बटन मशरूम 120 रुपए प्रति किलो बिकता है, जबकि औषधीय मशरूम 20 गुना तक ज्यादा रेट देता है।
लागत से तीन गुना मुनाफा की गारंटी :
खेती और मूल्य संवर्धन के गणित को देखने पर लागत व मुनाफा पर आकर बात रुक जाती है। इसमें 100 बैग गैनोडर्मा लगाने में 25 हजार रुपए का खर्च आता है। जिससे 4 महीने में 20-25 किलो सूखा मशरूम मिलता है। जो 3 हजार रुपए प्रति किलो की दर से बिकता है। इस प्रकार किसान को 60-75 हजार रुपए प्राप्त हो जाता है। कुल मिला कर लागत से कम से कम तीन गुना मुनाफा की गारंटी है।
कॉर्डिशेप्स से 18 लाख सालाना का टर्न ओवर :
विदित हो कि, समस्तीपुर के सफल किसान के रूप में रोसड़ा के युवा किसान राकेश कुमार ने 2023 में 1 कमरे से कॉर्डिसेप्स की खेती शुरू की। आज उनका सालाना टर्नओवर 18 लाख का है। वे बताते हैं, “हैदराबाद की एक कंपनी उनका सारा उत्पाद खरीद लेती है। उन्होंने पूसा से ही ट्रेनिंग लेकर उत्पादन शुरू किया था।
7 दिवसीय ट्रेनिंग हर महीने :
इस अवसर पर कुलपति डॉ. पी.एस. पांडेय ने कहा कि, “आज मशरूम उत्पादन में बिहार को नंबर वन बनाने में विश्वविद्यालय स्थित एडवांस सेंटर ऑफ मशरूम रिसर्च और डॉ. दयाराम का बहुत बड़ा योगदान है। डॉ. दयाराम के निर्देशन में विश्वविद्यालय में औषधीय मशरूम उत्पादन एवं प्रसंस्करण पर 7 दिवसीय ट्रेनिंग हर महीने चलती ही रहती है।”
पराली जलाने की समस्या का समाधान :
उन्होंने बताया कि, “धान के पुआल, गेहूं के भूसा से तैयार कंपोस्ट के साथ 20-30 डिग्री और 80 प्रतिशत नमी में मशरुम उत्पादन केलिए आवश्यक है। यदि बिहार के 5 प्रतिशत किसान भी औषधीय मशरूम अपनाएं, तो राज्य 500 करोड़ रुपये का निर्यात कर सकता है। यह ‘पराली जलाने’ की समस्या का भी समाधान है, क्योंकि पुआल ही इसका मुख्य आधार है।
संचालन और धन्यवाद ज्ञापन :
कार्यक्रम का संचालन केंद्र प्रभारी डॉ. आरपी प्रसाद एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ आर.पी.के. राय ने किया।