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लय की चपलता के बीच विविध भाव, रस एवं लालित्य का अद्भुत संयोग है कत्थक की निजी विशेषता : डॉ. संजय कुमार राजा

पांच दिवसीय कार्यशाला के तीसरे दिन कत्थक पर विशेष व्याख्यान आयोजित
Dr. Sanjay KumarBy Dr. Sanjay Kumar04/06/2026Updated:05/06/2026No Comments3 Mins Read
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प्रशिक्षण देते प्रशिक्षक।

ओईनी न्यूज नेटवर्क।

Oini 24 ओईनी। “नृत्य हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न अंग है। स्त्री हो या पुरुष, बच्चे, युवा, प्रौढ़ हों या बुजुर्ग सभी अपनी दिनचर्या में जाने अनजाने नृत्य करते रहते हैं, ये और बात है कि उसे हम नृत्य के रूप में नहीं जानते।”

लय एवं अभिनय प्रधान क्रिया है नृत्य :

शारदा सावित्री अनिल संगीत महाविद्यालय में चल रहे पांच दिवसीय कत्थक, कजरी, व मिथिला पेंटिंग कार्यशाला के तीसरे दिन मुख्य अतिथि जगमोहन विद्यापति कॉलेज ऑफ आर्ट एंड टेक्नोलॉजी ओईनी के संस्थापक डॉ. संजय कुमार राजा ने कत्थक के प्रशिक्षुओं को संबोधित करते हुए उक्त बातें कही। उन्होंने बताया कि, शास्त्रीय नृत्य हो या लोक नृत्य, नृत्य पूर्णतः लय एवं अभिनय प्रधान क्रिया है।

वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित संपूर्ण व्यायाम :

उन्होंने कहा कि, “भारत वर्ष में प्रचलित कत्थक, भरतनाट्यम, ओडिसी, कुचीपुड़ी, कथककली, मणिपुरी, सहित करीब 8 नृत्य शैलियों में से कत्थक उत्तर भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय एवं प्रचलित नृत्य शैली है। लय की चमत्कारिक चपलता के बीच विविध भाव, रस एवं लालित्य का अद्भुत संयोग कत्थक की निजी विशेषता है।” डॉ. राजा ने कहा कि, नृत्य सिर्फ ताल लय बद्ध रंजक क्रिया नहीं बल्कि वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित संपूर्ण व्यायाम भी है।

जो करो उसे जानो :

इसके पूर्व शारदा सावित्री अनिल संगीत महाविद्यालय की संस्थापक डॉ सुनील कुमार सिंह ने मुख्य अतिथि का तिलक, एवं अंगवस्त्र से अभिनन्दन किया। तत्पश्चात श्री राजा ने प्रशिक्षुओं को कत्थक की विशेषताएं, कथक और कत्थक में अंतर, कत्थक में पदाघात के प्रकार, ग्रीवा संचालन, भृकुटी संचालन, भाव–भंगिमा, घूमर, अभिनय, कत्थक के घराने आदि के बारे में विस्तार से बताया और कहा कि “जो करो उसे जानो, जो जानो उसे करो इसी में वास्तविक परमानंद निहित है।”

दी विभिन्न लय में पढ़न्त की जानकारी :

बताते चलें कि, शारदा सावित्री अनिल संगीत महाविद्यालय में सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं व धरोहरों के संरक्षण व संवर्धन अभियान के तहत चल रहे पांच दिवसीय कार्यशाला के तीसरे दिन प्रशिक्षिका नयन प्रिया ने कत्थक नृत्य में हस्तक और पढ़न्त के महत्व, एवं हाथों से तीनताल में विलंबित, मध्य तथा द्रुत लय में पढ़ंत का प्रशिक्षण दिया।

कजरी और पेंटिंग :

दूसरी तरफ़ मैथिली के सुप्रसिद्ध लोकगायक प्रशिक्षक कृष्ण कुमार कन्हैया ने केइसे खेले जायब सावन में कजरिया बदरिया घिर आई ननदी ‘ सहित कजरी गीतों को गाने का तरीका बताया। वहीं मिथिला पेंटिंग में प्रशिक्षक किशोर ब्रजेंद्र ने गणेश तथा सूर्य देव के आकृति बनाने की जानकारी दी।

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