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Home » शोध परिषद की बैठक में 50 कृषि परियोजनाओं को वित्त पोषण की मिली हरी झंडी, 2-3 साल में दिखेगा असर

शोध परिषद की बैठक में 50 कृषि परियोजनाओं को वित्त पोषण की मिली हरी झंडी, 2-3 साल में दिखेगा असर

21वीं अनुसंधान परिषद की दो दिवसीय विशेष बैठक संपन्न
Dr. Sanjay KumarBy Dr. Sanjay Kumar07/08/2026No Comments4 Mins Read
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बैठक में शामिल वीसी व अन्य।
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 पूसा। प्रयोगशाला में विकसित नवाचारों को सीधे किसानों के खेत तक पहुंचाना हमारा प्राथमिक लक्ष्य है। ये लक्षित परियोजनाएं जलवायु अनुकूलन, प्राकृतिक खेती और डिजिटल कृषि पर केंद्रित हैं, जो दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाने के लिए जरूरी हैं। उन्होंने कहा स्वीकृत परियोजनाओं के परिणाम अगले दो से तीन वर्षों में सामने आएंगे। आशा है कि इन परिणामों से भारतीय कृषि और किसानों को काफी फायदा होगा। साथ ही उन्नत शोध से विश्वविद्यालय को अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग प्राप्त करने में भी मदद मिलेगी। 
प्राकृतिक संसाधनों का हो सकेगा बेहतर उपयोग :
21वीं अनुसंधान परिषद की विशेष बैठक के दूसरे दिन अपने अध्यक्षीय संबोधन के दौरान कुलपति डॉ. पीएस पाण्डेय ने उक्त बातें कही। उन्होंने कहा कि, स्वीकृत परियोजनाओं के माध्यम से क्षेत्र की कृषि में अगली पीढ़ी की तकनीकें शामिल की जाएंगी। इसके तहत एआई और मशीन लर्निंग की मदद से कीटों के प्रकोप और पोषक तत्वों की कमी की पहले से पहचान कर प्रेडिक्टिव कृषि की जाएगी। साथ ही रिमोट सेंसिंग और जीआईएस तकनीक से मिट्टी के स्वास्थ्य, सतही नमी और भूजल स्तर की लगातार निगरानी होगी। शोध के उपरांत विकसित उपकरणों से सटीक सिंचाई और उर्वरकों के लक्षित सूक्ष्म उपयोग को बढ़ावा मिलेगा, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा।
जटिल कृषि-जलवायु चुनौतियों का समाधान :
बताते चलें कि, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा में आयोजित दो दिवसीय विशेष शोध परिषद बैठक में लगभग 50 उच्च-प्रभाव वाली तकनीक आधारित कृषि शोध परियोजनाओं को विश्वविद्यालय से वित्त पोषण की मंजूरी दी गई। इन परियोजनाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रिमोट सेंसिंग, ड्रोन तकनीक और जैव-प्रबलित फसल किस्मों के विकास पर विशेष बल दिया गया है, ताकि जटिल कृषि-जलवायु चुनौतियों का समाधान किया जा सके।
अगले दस वर्ष में ही भारत बन जाएगा विश्व गुरू :
बैठक में बाह्य विशेषज्ञ के रूप में बोलते हुए रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी के निदेशक शोध डॉ.एस के. चतुर्वेदी ने कहा कि यह विश्वविद्यालय में प्रस्तावित वैज्ञानिक रणनीतियां मृदा स्वास्थ्य और कृषि की महत्वपूर्ण चुनौतियों को सीधे संबोधित करती हैं। विश्वविद्यालय में जिस प्रकार के शोध प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया है उनका मानक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का है। अगर इस तरह के शोध अन्य कृषि विश्वविद्यालयों में भी किये जायें तो मुझे पूरा विश्वास है कि कृषि के क्षेत्र में अगले दस वर्ष में ही भारत विश्वगुरू बन जायेगा। 
आएगी किसानों की लागत में भारी कमी :
इस दौरान आईसीएआर-केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ के पूर्व निदेशक डॉ. शैलेंद्र राजन ने नई कृषि तकनीकों के आर्थिक लाभों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि शोध प्रतिवेदन में जो संकल्पनायें है वो क्रांतिकारी है। जैव-नवाचारों को डिजिटल विस्तार उपकरणों के साथ जोड़ना एक महत्वपूर्ण कदम है। संसाधन संरक्षण के साथ आधुनिक कीट प्रबंधन से किसानों की लागत में भारी कमी आएगी।
दो–तीन वर्षों में बन जाएगा विश्व स्तर पर पहचान :
उन्होंने कहा कि पिछले तीन वर्षों में विश्वविद्यालय ने अनिश्चितकालीन बंद की स्थिति से निकलकर अखिल भारतीय रैंकिंग में उल्लेखनीय स्थान हासिल किया है। इसका विकास देखकर वे चकित हैं। मुझे उम्मीद है कि अगले दो-तीन वर्षों में यह विश्व मानचित्र पर भी अपनी पहचान बनाएगा। डॉ. पाण्डेय के नेतृत्व और प्रबंधन शैली‌ की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि, अन्य कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को भी यहां आकर सीख लेनी चाहिए और विकास की तीव्र प्रक्रिया को अपनाना चाहिए। 
परिणाम अगले दो से तीन वर्षों में खेतों पर :
बैठक में बाह्य विशेषज्ञ के रूप में डॉ. सचिन नंदगुड़े, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, मृदा एवं जल संरक्षण अभियंत्रण, एमपीकेवी रहूरी, महाराष्ट्र ने शोध परियोजनाओं के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे और तकनीक आधारित शोध की प्रासंगिकता पर बल दिया। इस दौरान निदेशक शोध डॉ. ए. के. सिंह ने परियोजनाओं के क्रियान्वयन की रूपरेखा बताते हुए कहा कि परिषद ने सटीक कृषि, उन्नत बीज प्रौद्योगिकी और जैव-प्रबलित किस्मों से संबंधित लगभग 50 परियोजनाओं का गहन मूल्यांकन कर उन्हें स्वीकृति दी है। इनमें से अधिकांश अभिनव परियोजनाओं के ठोस परिणाम अगले दो से तीन वर्षों में खेतों पर देखने को मिलेंगे।
होगा डेटा आधारित कृषि पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित :
गौरतलब है कि दो दिवसीय अनुसंधान परिषद की बैठक के पहले दिन बैठक लगभग रात दस बजे तक चली थी। दूसरे दिन बैठक के समापन सत्र में वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं ने आशा व्यक्त की कि इन तकनीक आधारित शोध पहलों के परिणाम सामने आने पर क्षेत्र का कृषि परिदृश्य पूरी तरह बदल जाएगा और एक टिकाऊ, डेटा आधारित कृषि पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित होगा।
उपस्थिति :
मौके पर विश्वविद्यालय के डीन पीजीसीए डॉ. मयंक राय, निदेशक स्कूल आफ़ एग्री-बिजनेस एंड रूरल मैनेजमेंट डॉ. रामदत्त, डीन फिशरीज डॉ. पीपी श्रीवास्तव, सह निदेशक शोध डॉ. संतोष ठाकुर एवं डॉ. मुकेश कुमार, पीआरओ डॉ. कुमार राज्यवर्धन समेत कई प्राध्यापक वैज्ञानिक एवं पदाधिकारी उपस्थित रहे।

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and Dr. Mukesh Kumar Dr. Kumar Rajyavardhan Dr. Mayank Rai Dr. P.P. Srivastava Dr. PS Panday Dr. Rajendra Prasad Central Agriculture University Pusa Dr. Ramdutt Dr. Santosh Thakur School Of Agri Business And Rural Management
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