
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 पूसा। “कृषि में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, ड्रोन तकनीक और प्राकृतिक खेती का समावेश अब भविष्य की जरूरत है। उन्होंने कहा विश्वविद्यालय कुछ गांवों में में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित फसल निगरानी और ड्रोन से छिड़काव के पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर चुका है।”
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा में 21वीं अनुसंधान परिषद (खरीफ) की तीन दिवसीय बैठक की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी. एस. पाण्डेय ने उक्त बातें कही। उन्होंने कहा कि, “जलवायु परिवर्तन आज कृषि के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे में डिजिटल तकनीकों को अपनाना अब विकल्प नहीं, आवश्यकता बन गई है।”
उन्होंने कहा कि, “वैज्ञानिकों का प्राथमिक लक्ष्य है अनुसंधान को ‘लैब टू लैंड’ पहुंचाना है। क्योंकि, प्रयोगशाला में विकसित तकनीक तभी सार्थक है जब वह किसान के खेत तक पहुंचे और उससे किसानों को लाभ हो।”
तकनीक-आधारित कृषि अनुसंधान की रूपरेखा :
बताते चलें कि, विद्यापति सभागार में आयोजित 21वीं अनुसंधान परिषद (खरीफ) की तीन दिवसीय बैठक के उद्घाटन सत्र में पिछले वर्ष के अनुसंधान कार्यों की समीक्षा की जायेगी और आधुनिक, जलवायु-अनुकूल एवं तकनीक-आधारित कृषि अनुसंधान की रूपरेखा तय करने पर विचार किया जायेगा।

स्वागत, व विमोचन :
इस अवसर पर सबसे पहले कुलपति डॉ पीएस पाण्डेय सहित आगत अतिथियों द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन और विश्वविद्यालय कुलगीत प्रसारण एवं स्वागत अभिनंदन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। तत्पश्चात कृषि अनुसंधान निदेशालय द्वारा प्रकाशित तकनीकी पुस्तकों, शोध बुलेटिन और विस्तार पुस्तिकाओं का विमोचन और मक्का एवं बीज पर स्टेटस रिपोर्ट का भी लोकार्पण किया गया।
देश की कृषि को देंगे नई दिशा :
इस अवसर पर जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय और नवसारी कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. ए.आर. पाठक ने कहा कि विश्वविद्यालय ने पिछले लगभग चार वर्षों में देश भर में अपना महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया है। यहां के अनुसंधान और विकसित प्रभेदों से सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि देश भर के कृषकों को फायदा हो रहा है। उन्होंने कहा कि डिजिटल एग्रीकल्चर के क्षेत्र में विश्वविद्यालय के प्रयास अन्य विश्वविद्यालयों को भी नई राह दिखा रहे हैं। यहां लीची, मखाना और मक्का जैसी फसलों पर उच्च स्तरीय अनुसंधान हो रहे हैं जो आने वाले समय में देश की कृषि को नई दिशा देंगे।
महिला किसानों के नेतृत्व वाला मॉडल अनुकरणीय :
डॉ. पाठक ने कहा फसल के साथ पशुपालन, मत्स्य और बागवानी को जोड़ना भी आवश्यक है, ताकि जोखिम घटे और आमदनी बढ़े। अपने संबोधन में डॉ पाठक ने विश्वविद्यालय के महिला किसानों के नेतृत्व वाले मॉडल को अन्य विश्वविद्यालयों को भी अपनाने की वकालत की।
उर्वरक का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना जरूरी :
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. इंदु शेखर सिंह, ने कहा कि, विश्वविद्यालय ने मखाना के क्षेत्र में उत्कृष्ट अनुसंधान संस्थान की शुरुआत की है और इसमें उन्नीस वैज्ञानिकों की टीम लगाई गई है। मखाना के खेती, प्रसंस्करण , यंत्र और पूरे मार्केट चेन पर वैज्ञानिक ने विश्विद्यालय में कार्य शुरू कर दिया है। इन अनुसंधान के परिणाम से मखाना अनुसंधान को काफी फायदा होगा। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों को जलवायु स्मार्ट बीजों पर भी कार्य करने के साथ –साथ मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आंकड़ों का उपयोग कर उर्वरक का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक है।
2 संकर किस्में और दलहन में रोग प्रतिरोधी लाइनें विकसित :
इसके पूर्व अनुसंधान निदेशक डॉ. ए. के. सिंह ने स्वागत संबोधन के दौरान विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि, पिछले वर्ष अनुसंधान की प्रमुख उपलब्धियों का ब्योरा देते हुए बताया कि पिछले वर्ष सूखा रोधी धान की 3 किस्में, मक्का की 2 संकर किस्में और दलहन में रोग प्रतिरोधी लाइनें विकसित की गईं हैं।
सहयोग :
बताते चलें कि, यह 21वीं अनुसंधान परिषद की बैठक तीन दिनों तक चलेगी। इस दौरान विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों के डीन और विभिन्न वैज्ञानिक अपनी अंतर्राष्ट्रीय , राष्ट्रीय एवं एवं विश्वविद्यालय संपोषित शोध परियोजनाओं की प्रस्तुति देंगे। इन परियोजनाओं को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भारत सरकार, बिहार सरकार, नाबार्ड और यूनिसेफ जैसी संस्थाओं का सहयोग प्राप्त है।
61 नए शोध प्रस्तावों पर भी चर्चा :
तकनीकी सत्रों में मिलेट्स, मखाना और लीची संवर्धन, प्राकृतिक व जैविक खेती, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मूल्य एवं मौसम पूर्वानुमान और फसल सुरक्षा से जुड़े 61 नए शोध प्रस्तावों पर भी चर्चा होगी। बैठक में मक्का की दो नई उन्नत संकर किस्मों राजेन्द्र हाइब्रिड मक्का 5 और राजेन्द्र हाइब्रिड मक्का 6 की पहचान और विमोचन को लेकर भी बाह्य विशेषज्ञो के द्वारा अंतिम निर्णय लिया जाएगा। बैठक में विश्वविद्यालय के सभी वैज्ञानिक, विषय विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी शामिल हुए।
