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Home » क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद की सख्त जरूरत – प्रोफेसर अबू बकर अबाद

क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद की सख्त जरूरत – प्रोफेसर अबू बकर अबाद

Dr. Sanjay KumarBy Dr. Sanjay Kumar24/12/2025Updated:24/12/2025No Comments3 Mins Read
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  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के स्वर्णिम अवसर – प्रोफेसर मुश्ताक अहमद
परिचर्चा का उद्घाटन करते अतिथि व अन्य।

ओईनी न्यूज नेटवर्क।

Oini 24 डेस्क दरभंगा। किसी भी भाषा को समृद्ध बनाने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं के अनुवाद की बहुत आवश्यकता है, क्योंकि क्षेत्रीय भाषा केवल एक भाषा ही नहीं बल्कि उस विशेष क्षेत्र की संस्कृति और सभ्यता का दर्पण भी होती है। इसलिए, जब हम क्षेत्रीय भाषाओं के अनुवादों से रूबरू होते हैं, तो हमें विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं के बारे में भी जानकारी मिलती है।

दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली के उर्दू विभागाध्यक्ष सह प्रख्यात उर्दू आलोचक एवं शोधकर्ता प्रोफेसर (डॉ) अबू बकर अबाद ने उक्त बातें सीएम साइंस कॉलेज दरभंगा में आयोजित एक परिचर्चा के दौरान कही। वे स्थानीय सी.एम. कॉलेज में उर्दू विभाग द्वारा क्षेत्रीय भाषाओं के महत्व और प्रासंगिकता विषय पर आयोजित एक परिचर्चा में विशिष्ट अतिथि के रूप में बोल रहे थे।

उन्होंने कहा कि बिहार में कई क्षेत्रीय भाषाएँ हैं जिनमें साहित्य लेखन की प्राचीन परंपरा है, इसलिए यहाँ की विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य का उर्दू में और उर्दू साहित्य का क्षेत्रीय भाषा में अनुवाद करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

प्रोफेसर अबाद ने कहा कि प्रोफेसर मुश्ताक अहमद का यह प्रयास सराहनीय है कि वे मिथिलांचल की क्षेत्रीय भाषा मैथिली के लेखकों और कवियों की रचनाओं का उर्दू में और उर्दू साहित्य का मैथिली में अनुवाद करते रहते हैं। उन्होंने डिप्टी नज़ीर अहमद के उपन्यास “मरातुल अरूस का मैथिली में”, “कन्यक आईना” और “बाबा नागार्जुन के मैथिली उपन्यास बालचंमा” का उर्दू में अनुवाद किया है, जो उर्दू भाषा और साहित्य के लिए वास्तव में उपयोगी है।

अतिथियों का मिथिला की परंपरा के अनुसार पाग शॉल आदि से स्वागत सम्मान और अतिथियों द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलन के साथ आरंभ परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए, सी.एम. कॉलेज, दरभंगा के प्रधानाचार्य प्रोफेसर (डॉ) मुश्ताक अहमद ने कहा कि हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति मे क्षेत्रीय भाषाओं के संवर्धन का समर्थन किया है और इसमें प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक के अवसर प्रदान किए गए हैं। जो निस्संदेह भारत जैसे बहुभाषी देश के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकते हैं।

प्रोफेसर अहमद ने कहा कि मिथिला में मैथिली भाषा का साहित्यिक दृष्टि से भी बहुत महत्व है, क्योंकि 14वीं शताब्दी में विद्यापति जैसे महान कवि का जन्म यहीं हुआ था, जिन्होंने मैथिली कविता को जन्म दिया और मैथिली में अनुकरणीय रचनाएँ लिखीं।

उन्होंने कहा कि मैथिली भाषा के साहित्य का उर्दू में अनुवाद और उर्दू साहित्य के प्रतिनिधि कवियों और गद्य लेखकों की रचनाओं का मैथिली में अनुवाद दोनों भाषाओं के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है।

इस परिचर्चा में सीएम कॉलेज के उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. खालिद अनजुम उस्मानी, डॉ. फैजान हैदर, डॉ. शबनम, डॉ. मुजाहिद इस्लाम, डॉ. मसरूर हैदरी और ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आफताब अशरफ, प्रसिद्ध पत्रकार जफर अनवर शकरपुरी, प्रोफेसर शाहनवाज आलम, डॉ. रिजवान अहमद और अन्य लोगों ने भी इस परिचर्चा में अपने विचार व्यक्त किए और क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य के अनुवाद को समय की आवश्यकता बताया।

चर्चा के आरंभ में मुख्य अतिथि, प्रोफेसर अबू बकर अबाद का परंपरा के अनुसार पाग, चादर और गुलदस्ते से स्वागत किया गया। प्रोफेसर मुश्ताक अहमद ने उनका विस्तृत परिचय देते हुए कहा कि वर्तमान में डॉ. आबाद ने उर्दू साहित्य जगत के कथा साहित्यकारों के बीच एक विश्वसनीय आलोचक के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर ली है और उनकी आधा दर्जन पुस्तकें संदर्भ ग्रंथ का दर्जा रखती हैं। अंत में, डॉ. खालिद अंजुम उस्मानी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए धन्यवाद. ज्ञापित किया।

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