
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 डेस्क समस्तीपुर। प्रयोगशाला वह जगह है जहां सॉल्यूशन बदल बदल कर नए सॉल्वेंट प्राप्त कर उनका परीक्षण किया जाता है, राजनीति कोई प्रयोगशाला नहीं, जहाँ बार-बार चेहरों को बदलकर देखा जाए। बीजेपी की प्रयोग धर्मिता पर टिप्पणी करते हुए जिले के मशहूर शिक्षाविद हाजी मसूद हसन ने एक मुलाकात के दौरान संवाददाता से उक्त बातें कही।
उन्होंने कहा कि चर्चा जोरों पर है कि अगली विधान सभा में नीतीश कुमार सीएम नहीं होंगे। बीजेपी का कोई मुख्य मंत्री हो सकता है। इसकी पृष्ठ भूमि तैयार कर ली गई है। बार हर सीएम फेस के मुद्दे पर भाजपा नेताओं का गोलमोल जवाब इसी ओर इशारा करता है। इसी पर उन्होंने कहा कि
मुख्यमंत्री बदलने की रणनीति यदि बिना जनभावना और ज़मीनी समझ के अपनाई जाए, तो उसका असर केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहता — वह राष्ट्रीय राजनीति की जड़ों को भी हिला सकता है।
इसलिए आज यह चेतावनी बेहद माकूल और समीचीन है कि “सीएम बदलने के चक्कर में कहीं पीएम न बदल जाए।”
हाजी मसूद ने कहा हालिया कुछ वर्षों में पीएम नरेंद्र मोदी व गृह मंत्री अमित शाह और उनकी टीम ने अलग-अलग राज्यों में मुख्यमंत्री बदलकर राजनीतिक प्रयोग किए। फलस्वरूप कहीं सत्ता समीकरण सँभले, कहीं बिगड़े।
मगर बिहार की धरती कोई साधारण राजनीतिक ज़मीन नहीं है। यहाँ के लोगों की राजनीति में जितनी परिपक्वता और गहराई है, उतनी शायद किसी और राज्य में नहीं। बिहार के घर-घर में राजनीतिक चेतना है, कहते हैं यहां का कचरा बिनने वाला बच्चा भी गहरी राजनीतिक सूझ रखता है।
यहाँ की जनता नेताओं को देखती है, सुनती है, समझती है, पढ़ती है, परखती है और तब जा कर उन पर अपना प्यार लुटाती है और भरपूर समर्थन देती है।
इसीलिए जब भी बिहार में भी “नया प्रयोग” करने की कोशिश की गई और पार्टी के भीतर कुछ लोगों को उकसाकर, नीतीश कुमार को कमजोर दिखाने का प्रयास किया गया — तो उस खेल को जनता ने भाँप लिया।
नीतीश कुमार ने भी हर बार इस चुनौती को न केवल धैर्य और समझदारी से संभाला, बल्कि अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ से यह भी साबित किया कि बिहार की राजनीति अब किसी बाहरी प्रयोग की मोहताज नहीं है। हर बार उन्होंने अंदरूनी गद्दारों को पहचान कर, एक मज़बूत निर्णय लिया और पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरकर यह सन्देश दिया कि — “गब्बर रिटर्न”, यानी नीतीश अभी भी हैं, और पहले से कहीं अधिक मज़बूत हैं।
बीस वर्षों का विकास, जनता का विश्वास
नीतीश कुमार के लगभग दो दशकों के कार्यकाल ने बिहार को नई दिशा दी है।
सड़कें बनीं, बिजली हर गाँव तक पहुँची, बालिकाओं की शिक्षा के लिए साइकिल योजना ने इतिहास रचा, शासन व्यवस्था में पारदर्शिता आई, और सबसे बड़ी बात — बिहार की जनता ने अपने आत्म-सम्मान को फिर से पाया। जहाँ कभी अंधेरा और भय था, वहाँ अब शिक्षा और विकास की रौशनी है।
यही कारण है कि बिहार की जनता आज भी नीतीश कुमार पर भरोसा करती है। वह जानती है कि यह वही नेता हैं जिन्होंने बिहार को अराजकता से निकालकर विकास की राह पर रखा।
श्री मसूद ने कहा कि जनता का यह विश्वास आकस्मिक या रातों रात हुआ हृदय परिवर्तन नहीं है; यह बीस वर्षों की ईमानदार मेहनत का परिणाम है। यही वजह है कि फिलहाल बिहारवासी अब किसी और को मुख्यमंत्री के रूप में देखना नहीं चाहते।
वे जानते हैं कि नीतीश कुमार केवल एक चेहरा नहीं, बल्कि स्थिरता, अनुभव और विकास का प्रतीक हैं। जब जनता का विश्वास इस गहराई से जुड़ा हो, तो कोई भी बाहरी चाल, कोई भी “एक्सपेरिमेंट” उस भरोसे को नहीं तोड़ सकता।
राजनीति में सावधानी की ज़रूरत
केंद्र के लिए यह सोचने का समय है कि बार-बार चेहरों को बदलने की राजनीति अब उल्टा असर डाल सकती है।
अगर जनता की भावनाओं को समझे बिना निर्णय लिए गए, तो परिणाम मुख्यमंत्री बदलने तक सीमित नहीं रहेंगे — उनका प्रभाव प्रधानमंत्री स्तर तक जा सकता है।
क्योंकि जनता अब केवल जुमले और नारे नहीं, परिणाम चाहती है; केवल प्रयोग नहीं, स्थिरता चाहती है।
सर्वविदित सत्य है कि देश रत्न डॉ राजेन्द्र प्रसाद, जननायक कर्पूरी ठाकुर, लोकनायक जय प्रकाश नारायण, डॉ श्रीकृष्ण सिंह, की धरती बिहार की जनता किसी को गिराने या उठाने में देर नहीं करती। अब यह संदेश केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश में गूंजेगा।
इसलिए ज़रूरी है कि सत्ता के शिखर पर बैठे लोग बिहार की संवेदना और नीतीश कुमार के योगदान का सम्मान करें। वरना इतिहास यह भी लिख सकता है कि —
“सीएम बदलने के फेर में वाक़ई पीएम बदल गया।”