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रत्न शंकर भारद्वाज
ओईनी 24 विद्यापतिनगर । भारत में कई ऐसे जगह हैं जहां भक्त को भगवान ने प्रकट होकर दर्शन दिया है। जगह-जगह ऐसे स्थल साक्ष्य के रूप में विद्यमान हैं। ये जगह लोगों के लिए आस्था का केंद्र हैं। चाहे वो श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या हो या फिर श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा।
मगर पूरी दुनिया में ऐसा एक ही स्थल है जहां भगवान और भक्त दोनो की पूजा की जाती है, वह स्थान है बिहार के समस्तीपुर जिले का विद्यापतिधाम। इसे भक्त और भगवान का मिलन स्थल माना जाता है। यहां भगवान शिव व भक्त कवि कोकिल विद्यापति की पूजा एक साथ होती है।
भगवान शिव का यह मंदिर हजारों-लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है। लोग मानते हैं एक बार जो यहां सच्चे मन से याचना कर ले भोलेनाथ उसकी मन्नत जरूर पूरी करते हैं। ऐसी लोगों की आस्था है कि इस मंदिर मे दर्शन से मन की सारी मनोकामना पूरी होती है। विद्यापतिधाम भौगोलिक रूप से समस्तीपुर जिलामुख्यालय से लगभग 38 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिससे इसके दिव्य आलिंगन में सांत्वना चाहने वाले यात्रियों के लिए यह आसानी से सुलभ हो जाता है। यात्रा के विकल्प प्रचुर मात्रा में हैं, सड़क मार्ग, रेलवे मार्ग से इस पवित्र अभयारण्य तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।
समस्तीपुर से, टैक्सियों, बसों या निजी वाहनों के माध्यम से एक छोटी यात्रा तीर्थयात्रियों को विद्यापतिधाम के शांत वातावरण में ले जाती है, जहां प्रकृति की अलौकिक सुंदरता परमात्मा के आध्यात्मिक सार के साथ मिलती है। विद्यापतिधाम मंदिर की महिमा चारों ओर फैली हुई है। यही कारण है यहां सावन के अलावा अन्य दिनों में भी श्रद्धालुओं की काफी भीड़ होती है। सावन में सोमवारी के दिन यहां जलाभिषेक करनेवाले श्रद्धालुओं की संख्या दो लाख तक पहुंच जाती है।
सावन में उत्तर बिहार के विभिन्न जिलों और नेपाल तक से विद्यापतिधाम मंदिर में अभिषेक, पूजन के अलावा मन्नत मांगने उतारने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। यहां बड़ी संख्या में लोग कांवर लेकर भी आते हैं। स्थानीय व आसपास के जिलों के लोग मंदिर में आने से पहले समीप के चमथा, झमटिया और कटहा स्थित गंगा घाटों पर स्नान के बाद जलाभिषेक के लिए गंगाजल लेते हैं।
बड़ी संख्या वैसे श्रद्धालुओं की भी है जो घर से सीधे मंदिर पहुंचते हैं। ऐसे श्रद्धालुओं में कुछ तो मंदिर के पंडों से जल लेते हैं जबकि बड़ी संख्या में लोग मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित कुएं से जलाभिषेक के लिए जल लेते हैं। शिवभक्त रत्न शंकर भारद्वाज ने बताया कि इस स्थल पर ही भगवान शंकर व मां गंगा के परमभक्त आदि कवि विद्यापति का निर्वाण हुआ था।
अपने जीवन के चैथेपन में वो मां गंगा के लिए चले। पैदल चलते-चलते थक जाने पर यहां बैठ गये। उसके बाद पास में मौजूद चरवाहे से पूछा कि यहां से गंगा कितनी दूर है। जिस पर चरवाहे ने ढाई से तीन कोस की दूरी बतायी। इसके बाद विद्यापति यह कहते हुए वहीं रुक गये कि वे उतनी दूर से मां गंगा के लिए आ सकते हैं तो मां गंगा यहां तक नहीं आ सकती है? उन्होंने गंगा का आह्वान किया कि मैं अब नहीं चल सकता अब यदि आपकी मर्जी होगी तो ही आपके दर्शन कर सकुंगा। कहते हैं यहां से करीब 12 किलोमीटर दूर बह रही गंगा से एक धारा अचानक फूटी और महाकवि को अपने आगोश में समेटती पुनः मुख्य धारा में मिल गई।
जहां से धारा फूटी थी वह जगह झमटिया नाम से प्रसिद्ध है। विद्यापतिघाम मंदिर में भगवान शिव के साथ उनके परम भक्त आदि कवि विद्यापति की भी लोग पूजा करते हैं। मुख्य मंदिर में एक बड़ा और एक छोटा पत्थर है। बड़े पत्थर को विद्यापति और छोटे पत्थर को शिवलिंग बताया जाता है।