
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
आलेख : निरंजन कुमार।
हर पल सूचना और तकनीक से घिरा आदमी जब अपने ही विचारों की भीड़ में खो जाता है, तब उसे स्वयं की तलाश होती है। स्क्रीन के नीले प्रकाश में आंखें तो थकती हैं ही, साथ ही मस्तिष्क भी निरंतर सूचनाओं के दबाव में जर्जर होने लगता है। यही डिजिटल तनाव है। यह तनाव एक ऐसी मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति सामाजिक प्राणी होते हुए भी स्वयं से दूर हो जाता है। उसके पास समय की कमी नहीं होती, पर स्वयं के लिए एक क्षण भी नहीं होता।
डिजिटल युग में मनुष्य ने गति तो प्राप्त की परन्तु गहराई को खो दिया है। वह मोबाइल की स्क्रीन पर अंगुली तो चलाता है, परंतु हृदय में शांति की अनुभूति नहीं कर पाता। तकनीकी विकास ने हमारे जीवन को सुविधाजनक तो बना दिया, लेकिन इस सुविधा के पीछे छिपा तनाव आज एक वैश्विक बीमारी का रूप ले चुका है।
इसी गहन संकट की घड़ी में योग ही वह मार्ग है, जो मनुष्य को बाहरी कोलाहल से निकालकर आंतरिक मौन की ओर ले जाता है। योग, केवल व्यायाम नहीं, बल्कि यह जीवन जीने की कला है। यह शरीर, मन और आत्मा के मध्य संतुलन की एक प्रक्रिया है।
संस्कृत में ‘योग’ शब्द ‘युज’ धातु से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है जोड़ना। यह जोड़ आत्मा का परमात्मा से, मन का विवेक से, और श्वास का चेतना से है। पतंजलि के योग सूत्रों में कहा गया है “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।” जब चित्त की सारी चंचलताएँ समाप्त हो जाती हैं, तभी योग की सच्ची अनुभूति होती है। योग का यह अर्थ है, अपने मूल स्वरूप में स्थिर हो जाना। यह स्थिरता ही आज के विखंडित मानसिक संसार को एक नया आयाम देती है।
डिजिटल तनाव का स्वरूप बहुआयामी है। यह केवल सूचना की अधिकता से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि उसमें निहित तुलना, प्रतिस्पर्धा, आकांक्षाएं और आभासी पहचान भी इसे जन्म देती हैं। सोशल मीडिया पर तुलना की प्रवृत्ति व्यक्ति को निरंतर आत्महीनता की ओर ढकेलती है। ‘फोमो’ अर्थात ‘फियर ऑफ मिसिंग आउट’ एक ऐसा मनोविकार बन चुका है, जिसमें व्यक्ति स्वयं की खुशी के बजाय दूसरों की उपस्थिति में अपनी अप्रासंगिकता को अनुभव करता है।
यह स्थिति उसे धीरे-धीरे अवसाद और चिंता की ओर ले जाती है। वैज्ञानिक शोधों ने यह प्रमाणित किया है कि डिजिटल उपकरणों का अत्यधिक प्रयोग अनिद्रा, सिरदर्द, एकाग्रता की कमी और सामाजिक अलगाव जैसे लक्षणों को जन्म देता है। ऐसे में योग एक ऐसा विज्ञान बनकर सामने आता है, जो न केवल शरीर को सुदृढ़ करता है, बल्कि मन और आत्मा को भी संतुलित करता है।
आसन शरीर की मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करते हैं, प्राणायाम श्वास को नियंत्रित कर मस्तिष्क को शांति प्रदान करता है, ध्यान मन को वर्तमान में स्थिर करता है, और योगनिद्रा मानसिक विश्राम की चरम अवस्था है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी स्वीकार किया है कि योग तनाव हार्मोन ‘कोर्टिसोल’ को कम करता है, नींद की गुणवत्ता में सुधार करता है, और तंत्रिका तंत्र को सुदृढ़ करता है।
योग का उल्लेख केवल आधुनिक विज्ञान में ही नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा में भी अत्यंत प्राचीन काल से होता आया है। ऋग्वेद में कहा गया है “ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।” यह तप, ध्यान और संयम का ही रूप है, जिसे योग के माध्यम से साधा जाता है। उपनिषदों में योग को आत्मा की यात्रा बताया गया है, जिसमें इन्द्रियों का संयम, मन की स्थिरता और ब्रह्म के साथ एकत्व प्रमुख है।
छान्दोग्य उपनिषद में उल्लिखित ‘तत्त्वमसि’ ‘तू ही वह ब्रह्म है’ यह अनुभूति योग साधना के द्वारा ही संभव है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण योग को जीवन का मूल मानते हुए अर्जुन को उपदेश देते हैं “योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।” अर्थात् कर्म में संलग्न रहो, परन्तु फल की आसक्ति को त्याग कर। यह समत्व की स्थिति ही योग है। यह उपदेश केवल युद्धभूमि में नहीं, बल्कि आज के मानसिक युद्धक्षेत्र में भी प्रासंगिक है, जहाँ व्यक्ति अपने ही विचारों से संघर्षरत है।
रामायण में जब लक्ष्मण ने सीता हरण के पश्चात श्रीराम को दुख में डूबे देखा, तब उन्होंने कहा “धैर्यं सर्वत्र साधनम्।” यह धैर्य, यह आत्मविनियमन ही योग का स्वरूप है। वाल्मीकि रामायण में योगवशिष्ठ संवाद में योग की परिभाषा गहराई से की गई है, जहाँ मन को संसार से हटाकर आत्मा में स्थिर करने को योग कहा गया है। महाभारत में भी भीष्म पितामह योगबल से ही गंगापुत्र का देहत्याग करते हैं। उन्होंने कहा “मनःप्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते।” अर्थात् मन को शांत करने का उपाय ही योग है।
यदि हम आधुनिक विज्ञान की भाषा में बात करें तो न्यूरोसाइंस यह सिद्ध कर चुका है कि योग और ध्यान से मस्तिष्क की न्यूरोप्लास्टी बढ़ती है, जिससे तनाव सहन करने की क्षमता, एकाग्रता और निर्णय क्षमता में सुधार होता है। एमिग्डाला, जो भय और तनाव का केंद्र है, उसका आकार ध्यान के अभ्यास से कम होने लगता है। साथ ही हिप्पोकैम्पस, जो स्मृति और सीखने से जुड़ा है, उसमें सक्रियता बढ़ती है।
आज की जीवनशैली में, जहाँ मल्टीटास्किंग को दक्षता का प्रतीक माना जाता है, योग सिखाता है कि एक क्षण में एक कार्य पूरी एकाग्रता से करना ही सच्ची कुशलता है। ध्यान के माध्यम से भावनात्मक संतुलन, निर्णय क्षमता और रचनात्मकता में वृद्धि होती है। यह केवल ध्यान नहीं, बल्कि स्वयं से जुड़ने का माध्यम है।
कबीरदास जी कहते हैं “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।” यही भाव योग में भी प्रतिध्वनित होता है। जब व्यक्ति अपने ही मन को जीत लेता है, तभी वह बाह्य संसार में सच्ची स्वतंत्रता और सफलता का अनुभव करता है। बच्चों और युवाओं के लिए योग न केवल शारीरिक स्वास्थ्य का साधन है, बल्कि ध्यान, प्राणायाम और योगासन उन्हें एकाग्रता, धैर्य और अनुशासन भी प्रदान करते हैं। डिजिटल यंत्रों से जुड़ी बेचैनी और चिड़चिड़ेपन से निपटने में योग एक सहज और प्रभावी समाधान है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह आत्म-संवाद और जीवंतता का माध्यम बन सकता है।
कार्यस्थल पर भी योग मानसिक स्पष्टता और टीम भावना को प्रोत्साहित करता है। कई वैश्विक कंपनियाँ ने योग और माइंडफुलनेस को कार्य संस्कृति में सम्मिलित किया है। इससे कर्मचारियों की उत्पादकता, मानसिक स्वास्थ्य और संबंधों में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है। योग कोई धर्म, मत या पंथ नहीं, बल्कि यह मनुष्य को उसकी वास्तविक प्रकृति की ओर ले जाने वाला मार्ग है।
यह शरीर को सजग, मन को शांत और आत्मा को प्रकाशित करता है। यह वह सेतु है जो शरीर को मन से, मन को आत्मा से और आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है। डिजिटल युग में, जब मनुष्य अपने अस्तित्व को स्क्रीन की रोशनी में खो देता है, तब योग ही वह प्रकाश है जो उसे भीतर की ओर लौटने का मार्ग दिखाता है। यही उसकी मुक्ति है, यही उसकी गति है और यही उसकी सच्ची उन्नति है।
(लेखक पटना उच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं।)