
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
विभूति कुमार
समस्तीपुर। लीची के फलों की तुड़ाई के बाद लीची के पेड़ो में लीची माइट, शूट बोरर आदि जैसे कई तरह के रोगों के लगने की संभावना बढ़ जाती है। बिहार के लीची उत्पादक किसानों के लिए यह अत्यंत जरूरी है कि वे लीची से अगले वर्ष अच्छी फलन प्राप्त करने के लिए इन तमाम तरह के रोगों की पहचान कर उसका समय से प्रबंधन करें। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविधालय पूसा के वैज्ञानिक डॉ. संजय कुमार सिंह ने दी है।
उन्होंने कहा कि लीची बिहार का प्रमुख फल है। इसे प्राइड ऑफ बिहार भी कहा जाता है। लीची की सफल खेती के लिए यह अत्यंत आवश्यक है की किसान लीची में लगने वाले प्रमुख कीट एवं उसके प्रबंधन की जानकारी हर हाल में वैज्ञानिकों से प्राप्त कर लें।
डाॅ सिंह ने बताया कि लीची माइट एक अति सूक्ष्मदर्शी मकड़ी प्रजाति का कीट है। इस कीट के नवजात और वयस्क दोनों ही लीची के कोमल पत्तियों की निचली सतह, टहनियों तथा पुष्पवृन्तों से लिपटकर लगातार पेड़ से रस को चूसते रहते है। रस चूसे जाने से पत्तियाँ मोटी एवं लम्बी होकर मुड़ जाती है तथा पत्तियों पर मखमली (भेल्वेटी) रुआं सा निकल जाता है जो बाद में भूरे या काले रंग में परिवर्तित हो जाता है तथा पत्ती में गड्ढे बन जाते है।
फलत: लीची की पत्तियां परिपक्व होने के पहले ही पेड़ से गिरने लगती है तथा पौधे बहुत ही कमजोर हो जाते है और शाखाओ में फल बहुत कम लगते है। इस कीट की रोकथाम के लिए किसान नवजात पत्तियों के निकलने से पहले एवं फल की तुड़ाई के बाद संक्रमित टहनियों को काट कर हटा दे।
जुलाई महीने में 15 दिनों के अंतराल पर क्लोरफेनपीर 10 ईसी (3 मिलीलीटर प्रति लीटर) या प्रोपारगिट 57 ईसी (3 मिलीलीटर प्रति लीटर) दवाइयों का घोल बनाकर पेड़ो पर दो बार छिड़काव करें। इसके अलावे अक्टूबर महीने में नए संक्रमित टहनियों की कटनी व छंटनी करके क्लोरफेनपीर 10 ईसी (3 मिलीलीटर प्रति लीटर) या प्रोपारगिट 57 ईसी (3 मिलीलीटर प्रति लीटर) दवाई का छिड़काव करें।
ऐसा करने से लीची माईट की उग्रता में भारी कमी आती है। कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि इस कीट के कैटरपिलर यानी (पिल्लू) लीची की नई कोपलों के मुलायम टहनियों से प्रवेश कर उनके भीतरी भाग को खाते है। इससे टहनियां सूख जाती है और पौधों की बढ़वार रुक जाती है।
इस कीट के प्रबंधन के लिए किसान इस कीट से आक्रांत टहनीयो को तोड़कर जला दे। बाद में किसान सायपरमेथ्रिन की 1 एमएल दवा प्रति लीटर पानी की दर से घोलकर नवजात पत्तियों के आने के समय 7 दिनों के अंतराल पर दो बार पर छिड़काव करें।