
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 समस्तीपुर। आधुनिकता के दौर में पारंपरिक लोक कलाओं और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए युवाओं को इससे जोड़ना जरूरी है। लोकगीत, लोकनृत्य, लोकनाट्य और पारंपरिक कलाएं किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान होती हैं। इनमें आम जनजीवन की भावनाओं, संस्कारों और सामाजिक सरोकारों की अभिव्यक्ति होती है।
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा की संगीत विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) लावण्या कीर्ति सिंह काव्या ने मंगलवार को अपने संबोधन में उक्त बातें कहीं। वे जननायक भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर की जन्मस्थली कर्पूरी ग्राम स्थित जी.के.पी.डी. महाविद्यालय में आयोजित ‘जीवन में लोक कला का महत्व’ विषयक संगोष्ठी को संबोधित कर रही थीं।
करने होंगे सामूहिक प्रयास :
उन्होंने स्थानीय लोक कलाओं के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि इसमें विद्यार्थियों और युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। लोक कलाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए सामूहिक प्रयास करने होंगे, ताकि सांस्कृतिक परंपराओं की निरंतरता बनी रहे।

उद्घाटन एवं स्वागत :
संगोष्ठी का उद्घाटन मुख्य अतिथि प्रो. (डॉ.) लावण्या कीर्ति सिंह काव्या, एमआरएम कॉलेज, दरभंगा की प्राचार्य प्रो. (डॉ.) पुष्पम नारायण, राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिलब्ध बांसुरी मर्मज्ञ डॉ. वेद प्रकाश और महाविद्यालय शासी निकाय के सचिव डॉ. अनीसुर रहमान ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। शासी निकाय की अध्यक्ष नमिता कुमारी ने अतिथियों का मैथिल परंपरा के अनुसार पाग और चादर भेंट कर स्वागत किया।
साक्षी ऋतु के निर्देशन में स्वरांजलि की छात्राओं ने स्वागत गीत और गोसाउनी गीत प्रस्तुत कर कार्यक्रम की शुरुआत की। इस दौरान लोक कला के सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक महत्व पर विस्तार से चर्चा हुई।
सामाजिक जागरूकता और एकता का माध्यम लोक कला :
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि एवं लनामिविवि, दरभंगा के एनएसएस कार्यक्रम समन्वयक डॉ. आर.एन. चौरसिया ने कहा कि लोक कला मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता और एकता का भी सशक्त माध्यम है। शैक्षणिक संस्थानों में लोक कला आधारित गतिविधियों को बढ़ावा देकर विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ा जा सकता है।
विद्यालय स्तर पर लोक कला से जुड़ी गतिविधियां आयोजित करने की जरूरत :
इस अवसर पर डॉ. अनुपम प्रिया, उमाशंकर पासवान और डॉ. लक्ष्मण यादव समेत अन्य वक्ताओं ने भी लोक कलाओं के संरक्षण एवं संवर्धन पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश और आधुनिक जीवनशैली के कारण कई पारंपरिक लोक कलाएं धीरे-धीरे सीमित होती जा रही हैं। ऐसे में स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन देने, युवाओं को प्रशिक्षण उपलब्ध कराने और विद्यालय एवं महाविद्यालय स्तर पर लोक कला से जुड़ी गतिविधियां आयोजित करने की जरूरत है। इससे सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ कलाकारों को पहचान और मंच भी मिलेगा।
लोकनृत्य और कला प्रस्तुतियों ने बांधा समां :
संगोष्ठी के दौरान युवा कला आश्रम के लक्ष्मण कुमार की टीम ने लोक कला पर आधारित नृत्य प्रस्तुत किया। वहीं, सुश्री कोमल ने अपने सहयोगियों के साथ कला का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम का संचालन नोडल पदाधिकारी सागर सिंह ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन संगीत विभागाध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमारी ने किया।
उपस्थिति :
मौके पर महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. राम प्रवेश ठाकुर, डॉ. स्नेहा, नित्यानंद ठाकुर, प्रो. दिनेश प्रसाद, प्रो. बसंत कुमार सहित अनेक शिक्षाविद, शिक्षक, शिक्षकेतर कर्मचारी और छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।।
2 Comments
> Bilkul sahi kaha Prof. Kavya ji ne. Aaj ke yuvaon ko apni lok kala aur sanskriti se jodna bahut zaruri hai. J.K.P.D college dwara is vishay par sangosthi ka aayojan ek sarahniya kadam hai.
> Bilkul sahi kaha Prof. Kavya ji ne. Aaj ke yuvaon ko apni lok kala aur sanskriti se jodna bahut zaruri hai. J.K.P.D college dwara is vishay par sangosthi ka aayojan ek sarahniya kadam hai.