
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 डेस्क समस्तीपुर। टेक्नोक्रेट्स और युवाओं के समन्वित प्रयास से मशरूम जगत में अपूर्व क्रांति आएगी जिससे दुनिया में दूसरे श्वेत क्रांति की राह आसान हो जाएगी जो मशरूम की कोख से उत्पन्न होगा।
मंगलवार को जिले के पूसा स्थित डॉ राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय विश्व विद्यालय के संचार केंद्र सभागार में आयोजित सात दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान मशरूम सलाहकार डॉ दयाराम ने संवाददाता से बातचीत के दौरान उक्त बातें कही।
मशरूम उत्पादन एवं प्रसंस्कृण तकनीक विषयक 7 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर के उद्घाटन के बाद वे संवाददाता से बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ग्रामीण एवं मेहनतकश महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन का प्रतीक, सेहत, स्वाद और समृद्धि का अद्भुत कॉम्बो खेती बिना खेत मशरूम बहुआयामी उपयोगिता वाला फसल है।
साथ हीआज जब हमारी धरती बेतहाशा उर्वरक के प्रयोग से कराह रही है, मृदा की उर्वरक क्षमता निरंतर कम होती जा रही है ऐसे में मशरूम के अवशेष प्राकृतिक खेती की दिशा में एक नई उम्मीद जगाती है। जी हां! मशरूम कंपोस्ट मृदा की उर्वरक क्षमता लौटाने में पूर्णतः सक्षम है।
डाॅ दयाराम ने कहा कि, एक समय था जब मशरूम सिर्फ ठंडे मौसम में ही उगाया जाता था। ओयेस्टर एवं बटन मशरूम का ही उत्पादन होता था। आज 05 डिग्री सेल्सियस से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान में मशरूम के करीब 12 प्रभेद उगाये जाते हैं, और बारहो महीने तथा हर मौसम में उगाये जाते हैं। प्रचूर मात्र में प्रोटीन का वाहक होने के साथ-साथ मशरूम विटामिन सी, विटामिन डी, विटामिन डी3 सहित कई पोषक तत्वों की आपूर्ति करता है।
इन 12 प्रभेदों में से 6 तो बडे पैमाने विकसित रूप में ग्रामीण क्षेत्र उगाये जाते हैं। इसी का परिणाम है कि आज हमारा सलाना उत्पादन 45 हजार टन प्रतिवर्ष है, 2025-26 में 50 हजार टन उत्पादन करने का लक्ष्य है।
डाॅ दयाराम ने कहा कि सिर्फ मशरूम नहीं, गांवों में मशरूम के 50 से अधिक उत्पाद बना कर खाये व बेचे जाते हैं। इसकी मांग वैश्विक स्तर पर बढी है। आज मशरूम एवं इसके उत्पादों का वैश्विक बाजार के अनुरूप व्यवसायिकरण करने की जरूरत है। यह सुखद संकेत है कि मशरूम के क्षत्र में नई पीढी एवं तकनीकी विशेषज्ञो की दिलचस्पी बढी है। यह पीढी निश्चित ही पूरे देश में श्वेत क्रान्ति 2 का वाहक बनेगी।