
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 समस्तीपुर। ग्लूकोमा (काला मोतियाबिंद) एक ऐसी बीमारी है जो धीरे-धीरे अंधेपन का कारण बनती है। इसे ‘साइलेंट थीफ ऑफ विजिबिलिटी’ (चुपके से दृष्टि चुराने वाली बीमारी) के नाम से भी जाना जाता है। ग्लूकोमा में ऑप्टिक नर्व (आंख की नस) को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। एक बार नुकसान हो जाने पर, दृष्टि को वापस पाना असंभव होता है। इसलिए सही समय पर इसका इलाज कराना बहुत ज़रूरी है।
ग्लूकोमा मरीजों के लिए वरदान एजीवी :
अंधेपन के विरुद्ध भरोसेमंद उम्मीद जिले के मुसरीघरारी स्थित मिथिला आँख हॉस्पिटल के मुख्य चिकित्सक नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. नवीन कुमार झा ने एक मुलाकात के दौरान संवाददाता से उक्त बातें कही। उन्होंने कहा कि, अहमद ग्लूकोमा वाल्व’ (एजीवी) के आने से ग्लूकोमा सर्जरी को न सिर्फ नया आयाम मिला है बल्कि यह ग्लूकोमा मरीजों के लिए वरदान भी सिद्ध होगा।
एजीवी तकनीक के आने के बाद ग्लूकोमा का इलाज आसान :
डॉ. झा ने कहा कि, ग्लूकोमा हालिया कुछ दिनों पूर्व तक एक लाईलाज बीमारी मानी जाती थी। दरअसल ग्लूकोमा मुख्य रूप से आंख के अंदर दबाव बढ़ने के कारण ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचाता है। ग्लूकोमा का इलाज दवा और सर्जरी से किया जाता है। किंतु एजीवी तकनीक के आने के बाद अब ऐसा नहीं है। अब ग्लूकोमा का इलाज संभव है।
एजेवी तकनीक का सफल प्रयोग करने वाला पहला हॉस्पिटल :
डॉ. झा ने बताया कि अभी हाल ही में मिथिला आँख हॉस्पिटल में एक ग्लूकोमा पीड़ित पर एजीवी तकनीक का सफल प्रयोग किया गया है। इस तकनीक की वजह से, अब दो सामान्य प्रक्रियाओं के बाद उसकी आंखें ठीक हो गई हैं। उन्होंने बताया कि मिथिला आँख हॉस्पिटल उत्तर बिहार का पहला संस्थान है जहां इस तकनीक का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया है।