
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 पूसा। लीची बिहार की पहचान और किसानों की आमदनी का प्रमुख स्रोत है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से स्टिंक बग के प्रकोप से किसान भारी नुकसान झेल रहे हैं। इस कीट के नियंत्रण केलिए केवल रासायनिक छिड़काव पर्याप्त नहीं है, बल्कि किसानों को जैविक और समेकित प्रबंधन को भी अपनाना होगा।
विश्वविद्यालय लीची किसानों के साथ :
मंगलवार को विश्वविद्यालय स्थित विद्यापति सभागार में आयोजित लीची स्टिंक बग प्रबंधन विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति डॉ. पीएस पाण्डेय ने उक्त बातें कही। उन्होंने कहा कि, इस कीट के नियंत्रण के लिए हमारे वैज्ञानिकों, कृषि विज्ञान केंद्रों और किसानों को मिलकर समन्वित प्रयास करना होगा। विश्वविद्यालय लीची किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है और उन्हें हर संभव तकनीकी सहयोग देने का प्रयास कर रहा है।

बताते चलें कि, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के विद्यापति सभागार में प्रसार शिक्षा निदेशालय एवं कीट विज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में मंगलवार को “लीची स्टिंक बग प्रबंधन” विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
उद्घाटन व प्रसार पुस्तिका का विमोचन :
इस अवसर पर अतिथियों के स्वागत के उपरांत विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी.एस. पाण्डेय एवं आगत अतिथियों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया। कार्यक्रम के दौरान लीची स्टिंक बग पर आधारित प्रसार पुस्तिका का विमोचन भी किया गया।
एक महत्वपूर्ण कदम :
इस अवसर पर अपने संबोधन में कुलपति डॉ. पी. एस. पाण्डेय ने कहा कि, प्रयोगशाला में विकसित तकनीक या अनुसंधान तभी सार्थक है जब वह खेत तक पहुंचे। आज का यह प्रशिक्षण हमारे ‘लैब टू लैंड’ कार्यक्रम की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
जैव-नियंत्रण एजेंटों के उपयोग की अनुशंसा :
मुख्य अतिथि निदेशक, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र, मुजफ्फरपुर डॉ विकास दास ने ने कहा कि लीची स्टिंक बग अब राष्ट्रीय समस्या बन चुका है। विश्वविद्यालय और लीची अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने द इसकी निगरानी, समय पर छिड़काव और जैव-नियंत्रण एजेंटों के उपयोग की स्पष्ट अनुशंसाएं दी हैं।
जागरूकता अभियान चलाएगा :
उन्होंने कहा कि किसानों को फरवरी-मार्च में ही कीट की निगरानी शुरू करनी चाहिए। अंड समूहों को नष्ट करना और परजीवी कीटों का संरक्षण सबसे प्रभावी उपाय है। उन्होंने कहा कि लीची अनुसंधान केंद्र मुजफ्फरपुर विश्वविद्यालय के साथ मिलकर जिला-स्तर पर जागरूकता अभियान चलाएगा, ताकि हर लीची उत्पादक किसान तक यह जानकारी पहुंच सके।
सरकार के सहयोग की आवश्यकता :
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहायक महानिदेशक डॉ. बी.बी. पटेल ने कहा कि विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय लीची अनुसंधान संस्थान के साथ मिलकर सराहनीय कार्य किया है। उन्होंने कहा कि इस कीट के नियंत्रण की तकनीक विश्वविद्यालय ने विकसित कर ली है और किसानों को जागरूक बनाने का प्रयास भी कर रहा है लेकिन इसके व्यापक नियंत्रण के लिए राज्य सरकार के सहयोग की भी आवश्यकता है।
जैविक नियंत्रण पर जानकारी :
अतिथियों का स्वागत करते हुए स्नातकोत्तर महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ मयंक राय ने विषय प्रवेश कराया। कार्यक्रम के दौरान तकनीकी सत्र मे विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने स्टिंक बग के जीवन-चक्र और पहचान पर, तथा राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने जैविक नियंत्रण पर विस्तार से जानकारी दी।
फील्ड प्रदर्शन और धन्यवाद ज्ञापन :
कार्यक्रम के अंतिम सत्र में सभी जिलों के कृषि विग्यान केंद्र के वैज्ञानिकों के साथ जिला-वार कार्ययोजना बनाई गई। इसमें निगरानी दल गठन, किसान पाठशाला और फील्ड प्रदर्शन शामिल हैं। कार्यक्रम के अंत में डॉ. सुधा नंद ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
उपस्थिति :
इस अवसर पर निदेशक प्रसार डॉ. आर. के. झा, निदेशक अनुसंधान डॉ. ए. के. सिंह, सहित बड़ी संख्या में वैज्ञानिक, प्रगतिशील किसान और स्नातकोत्तर छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।
