
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 संथालपरगना। अंतरराष्ट्रीय मैथिली परिषद की इकाई ‘संथाल परगना मित्र मंडल’ के तत्वावधान में मंगलवार को विषुव संक्रांति के अवसर पर अपना 16वाँ स्थापना दिवस ऑनलाइन कार्यक्रम के रूप में मनाया गया।
जूर शीतल व पर्यावरण संरक्षण :
कार्यक्रम की अध्यक्षता ओमप्रकाश मिश्र, देवघर ने की। इस अवसर पर प्राचार्य डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी, जमशेदपुर ने ‘जूर शीतल’ तथा पर्यावरण संरक्षण के परस्पर संबंध और महत्व पर विचार व्यक्त किए। धनबाद से आशा मिश्रा एवं आसनसोल से पूनम झा ने नववर्ष पर आधारित गीत प्रस्तुत किए।
आपसी संवाद में मैथिली का करें प्रयोग :
झारखंड इकाई के अध्यक्ष अमरनाथ झा ने संवत्सर की अवधारणा पर प्रकाश डाला। गोड्डा निवासी सुधांशु झा ने कहा इस पर्व के विविध सांस्कृतिक पक्षों पर प्रकाश डालते हुए विसुआ नामक संथाल परगना के कृषि उत्पाद से इसे जोड़ा और मैथिलों से आपसी संवाद मैथिली में ही करने का आग्रह किया।
मैथिली के अधिकारों पर चिंता :
मिथिला शिक्षा मंच के संयोजक पी. के. झा ‘प्रेम’ (दलसिंहसराय) ने संक्रांति पर्व की परंपराओं का वर्णन किया। मीनाक्षी शिवम, देवघर ने संथाल परगना की परंपराओं की सराहना करते हुए मैथिली के अधिकारों पर चिंता व्यक्त की।
मैथिली की दक्षिणी उपभाषा है अंगिका :
इस दौरान अंतर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद के संस्थापक डॉ. धनाकर ठाकुर ने 14 अप्रैल को ‘राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस’ घोषित करने की मांग करते हुए कहा कि यह नववर्ष नेपाल, असम, बंगाल, पंजाब, उड़ीसा एवं तमिलनाडु सहित कई राज्यों में वैज्ञानिक आधार पर मनाया जाता है। उन्होंने अंगिका को मैथिली की दक्षिणी उपभाषा बताते हुए जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन के मत का उल्लेख किया।
जूर शीतल की परंपराओं पर चर्चा :
इस अवसर पर सुरेश पासवान (बेगूसराय), विनय झा (दलसिंहसराय), डॉ. यू.सी. चौधरी, सूरज कुमार, पूनम झा (आसनसोल), रीता झा (कटनी/राजबिराज मूल निवासी), प्रतिभा स्मृति सहित सभी वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के दौरान जूर शीतल की परंपराओं—सत्तू-चना का सेवन, दान, पौधों को जल देना, बच्चों के सिर पर जल डालना—का विस्तार से वर्णन किया गया।
काव्य संक्रांति :
हर संक्रांति पर आयोजित कार्यक्रम “काव्य संक्रांति” के अंतर्गत विभिन्न कविताओं एवं गीतों का सस्वर पाठ किया गया। जिसमें डॉ. धनाकर ठाकुर ने ‘करौंदा’ (क्रैनबेरी) पर आधारित कविता प्रस्तुत की। जिसमें हरे, लाल, नारंगी एवं बैंगनी रंगों के माध्यम से जीवन के बाल्यावस्था, युवावस्था एवं परिपक्वता का वर्णन किया गया। इस क्रम में उन्होंने परदेशी पति के विरह में नव ब्याहता तरूणी के व्यथा पर आधारित एक गायन भी प्रस्तुत किया।
मीनाक्षी शिवम ने हास्य एवं स्वास्थ्य पर आधारित कविता “सब मिली हँसी, स्वस्थ रहि औषधि भेटल हँसी के संग” प्रस्तुत की। आशा मिश्रा ने भक्ति गीत— “महिषासुरमर्दिनी अम्बिके, कालिका भवानी” प्रस्तुत किया।
पूनम झा (आसनसोल) ने वृन्दावन-आधारित गीत— “हम कहैत छी दूर, हम सन आयल छी, उत्तर-दक्षिण हम मिलावल” प्रस्तुत किया। मीनाक्षी शिवम द्वारा लोकगीत— “चिरैया टुक-टुक ताकसित, फागुन बीतल, चैत्रो बीतल, नहि आयल बलम हे राम, फूलि गेल टेसू, फूलि गेल नीम हो राम” गाया गया।
धन्यवाद ज्ञापन :
इस दौरान झारखंड में एक बड़े सम्मेलन के आयोजन की मांग की गई। अंत में संस्थापक पटना पुस्तक मेला एन. के. झा, ने धन्यवाद ज्ञापन किया।