
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को शिक्षा मित्रों की सेवा नियमित करने के मामले में शीघ्र निर्णय लेने का निर्देश दिया है। जाग्गो व श्रीपाल केस में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले को आधार बनाते हुए कोर्ट ने उक्त आशय का आदेश दिया है।
अपर मुख्य सचिव को तीन सप्ताह में सौंप दे प्रत्यावेदन :
अपने फैसले में माननीय उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सभी 115 याचिका कर्ता अपना-अपना प्रत्यावेदन तीन सप्ताह के भीतर अपर मुख्य सचिव बेसिक शिक्षा को सौंप दें। इसके बाद अपर मुख्य सचिव को दो माह की समय सीमा में सहायक अध्यापक के पद पर नियमितीकरण के मामले में अंतिम फैसला लेना होगा।
हजारों शिक्षा मित्रों की जगी आस :
न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने तेज बहादुर मौर्य एवं 114 अन्य शिक्षा मित्रों की उस याचिका को निस्तारित करते हुए यह महत्वपूर्ण आदेश दिया है। याचिका कर्ताओं ने “सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के जून 2025 के आदेश के तहत वे नियमित किए जाने की मांग की थी। इस फैसले से हजारों शिक्षा मित्रों में बेहतर भविष्य की आस जगी है।”
अनुभव और तर्क के आधार पर नियमित किए जाने की मांग :
याचियों के अधिवक्ता सत्येंद्र चंद्र त्रिपाठी के अनुसार, ये सभी अभ्यर्थी बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालयों में वर्षों से कार्यरत हैं और अपनी लंबी सेवा और अनुभव के आधार पर सहायक अध्यापक के रूप में नियमित किए जाने की मांग की थी।
सरकार की दलील :
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से दलील दी गई कि, “हाईकोर्ट पहले भी ऐसे ही एक मामले में विशेष अपील को खारिज कर चुका है। सरकारी अधिवक्ता ने यह भी कहा कि यह पूर्णतः सरकार का नीतिगत मामला है, जिसमें अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।”
याचिका कर्ता का तर्क :
इस पर, याची के अधिवक्ता ने पलटवार करते हुए कहा कि, बदली हुई परिस्थितियों और सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देशों के आलोक में याचियों का दावा मजबूत है। इस पर गहन विचार करने के बाद कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह इन मामलों का गुण-दोष के आधार पर पुनः परीक्षण करे।
सरकार को दिया दो माह का समय :
कोर्ट ने राज्य सरकार को याचियों के मामले में दो माह के भीतर स्पष्ट निर्णय लेने का कड़ा आदेश जारी किया है. इस आदेश से उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत हजारों शिक्षा मित्रों में एक नई उम्मीद की किरण जागी है। अब सबकी निगाहें बेसिक शिक्षा विभाग के आगामी फैसले पर टिकी हैं कि वह इस कानूनी निर्देश का पालन किस प्रकार करता है।