
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
सुभाषचन्द्र कुमार।
समस्तीपुर/पूसा। डाॅ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविधालय के अधीनस्थ मत्स्यिकी महाविद्यालय के सभागार में आधुनिक मत्स्यपालन तकनीक एवं प्रबंधन विषय पर चल रहे छह दिवसीय प्रशिक्षण के तीसरे दिन प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए अधिष्ठाता डॉ पीपी श्रीवास्तव ने कहा कि बिहार राज्य में मछली उत्पादन के लिए समुचित जल क्षेत्र की उपलब्धता मत्स्य व्यवसाय के लिए वरदान साबित हो रहा है। तालाब के मछलियों को खाना खिलाने के दौरान समय का प्रबंधन करना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। बिहार के किसान कृषि कार्य में बहुत ही ईमानदारी के साथ प्रयासरत रहते है।
उनहोंने कहा कि मौसम अनुकूल हो तो कृषि आय दुगुनी ही नहीं 10 गुना तक लेने के लिए भी मत्स्य पालन सक्षम है। इससे उत्पादकों को बेहतर आमदनी प्राप्त करने के साथ साथ प्रदेश के अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण में सहयोगी बन सकते है। किसान चाह लें तो मछलीपालन व्यवसाय बिहार को बहुत बड़ा मुकाम दिलाने में कामयाब हो सकता है। मत्स्य पालकों को तकनीकी ज्ञान प्राप्त कर ही व्यवसाय को सफल बनाने की जरूरत है।
उन्होंने बताया कि किसी एक तालाब में तीन तरह के मछली की प्रजातियों पालने से बेहतर आहार प्रबंधन संभव हो पाता है। जिसमें कतला, रोहू एवं नैनी को शामिल किया जा सकता है। उक्त तीनों मछलियां अपने मुंह के बनावट के अनुसार आहार ग्रहण करती है। तालाबों में प्रतिदिन किसी एक निश्चित स्थान पर मछली का आहार देने पर मछलियों का झुंड समय से खाने के लिए पहुंच जाता है। मछलियों के एक प्रजाति जल ऊपर तैरते आहार को अपना ग्रास बनाता है वही दूसरा प्रजाति जल के मध्य भाग में गिरते हुए आहार को तथा तीसरा जल के तलाब में जल के निचले सतही आहार को खाती है। मुख्यरूप से विभिन्न प्रजातियों के मछली की मुंह बनावट अलग अलग आहार ग्रहण करने के दृष्टिकोण से प्रकृति ने बनाया है।
प्रशिक्षण के इस सत्र में शिवहर जिला के 30 मत्स्यपालक किसानों के लिए जिसका चयन बिहार सरकार के पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग के सौजन्य से आयोजित इस प्रशिक्षण से प्रशिक्षित होकर स्वरोजगार से जुड़ने का सुनहरा अवसर प्रदान की जाती है। संचालन निजी सहायक डाॅ राजेश कुमार ने की। मौके पर डाॅ शिवेंद्र कुमार, डाॅ सुजीत कुमार नायक, रौशन कुमार, साजन कुमार भारती आदि मौजूद थे।