
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
समस्तीपुर/पूसा । यूं तो बिना खेत की खेती वाली फसल मशरूम अपने आप में सेहत, स्वाद, आर्थिक स्वावलंबन का बेजोड काॅम्बो है। मगर इसके कुछ प्रभेद अपने रूप रंग, और औषधीय गुणों के कारण अपनी अलग पहचान रखते हैं।
डाॅ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय स्थित एडवांस सेंटर ऑफ मशरूम रिसर्च के पुर्व निदेशक देश-विदेश में मशरूम मैन नाम से विख्यात मशरूम वैज्ञानिक डाॅ दयाराम ने उक्त बातें संवाददाता से कही। एक निजी मुलाकात में उन्होंने संवाददाता को बताया कि शिटाके मशरूम एक अति स्वादिष्ट एवं औषधीय खाद्य पदार्थ के रूप में अपनी पहचान विकसित कर चुका है।
मशरूम विशेषज्ञ डाॅ दयाराम ने कहा कि इस मशरूम के उपयोग से कुपोषण मिटाने के साथ सफल व्यवसाय भी संभव है। सफेद बटन मशरूम की तुलना में शिटाके मशरूम अपेक्षाकृत अति स्वादिष्ट और बेशकीमती मशरूम है। इसमें उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन और विटामिन (विशेष रूप से विटामिन बी) भरपूर मात्रा में होते हैं। इसमें वसा और शर्करा नहीं होती है इसलिए यह मधुमेह और हृदय रोगियों के उपयोग के लिए बेहतर समझा जाता है।
मशरूम की खेती इसलिए सरल है कि इसकेलिए खेती योग्य जमीन की जरूरत नहीं होती। छोटे पैमाने पर लोग अपने घरों में, बिस्तर के नीचे भी मशरूम उत्पादन कर सकते हैं। साथ ही कृषि अपशिष्ट से यानि भूसा, पुआल, मक्के के विभिन्न हिस्सों और विभिन्न पेड़ों के पत्तों से तैयार कम्पोस्ट में इसकी खेती होती है।
आम तौर पर, एक किलोग्राम मशरूम के बीज से 10 से 15 किलोग्राम बटन, दुधिया, या शिटाके मशरूम उगता है। वहीं, ऑयस्टर मशरूम की खेती में यह मात्रा 15 से 20 किलोग्राम तक भी हो सकती है। उन्होंने बताया कि मशरूम की फसल करीब 40 से 50 दिनों में तैयार हो जाती है। मशरूम की खेती बंद कमरों में की जाती है, इसलिए बारिश या ओले का असर नहीं पड़ता।