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Home » मुंगेर की धरती से अब बिहार में भी शुरू होगी रबर की खेती,

मुंगेर की धरती से अब बिहार में भी शुरू होगी रबर की खेती,

Dr. Sanjay KumarBy Dr. Sanjay Kumar10/02/2026Updated:10/02/2026No Comments3 Mins Read
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रबर की खेती।

ओईनी न्यूज नेटवर्क।

Oini 24 मुंगेर। आम तौर पर ठंडे प्रदेशों में उगाये जाने वाले रबर की खेती अब बिहार में भी होगी। बिहार में के मुंगेर की धरती से इसकी शुरुआत शुरू होगी। मुंगेर विश्वविद्यालय ने इसको लेकर एक सकारात्मक पहल करते हुए भारतीय रबर अनुसंधान संस्थान कोट्टायम (केरल) एवं हिमालय वन अनुसंधान संस्थान शिमला के साथ एक त्रिपक्षीय करार किया है।

दो एकड़ जमीन और मजदूरी देगा मुंगेर विश्वविद्यालय :

इस बाबत जानकारी देते हुए मुंगेर विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. (डॉ.) घनश्याम राय ने बताया कि इस त्रिपक्षीय करार के मुताबिक भारतीय रबर अनुसंधान संस्थान मुंगेर विश्वविद्यालय को रबर के खाद, बीज और पौधे उपलब्ध करायेगा। साथ ही खाद की कीमत भी देगा। इसकेलिए मुंगेर विश्वविद्यालय दो एकड़ जमीन उपलब्ध कराएगा जिसमें रबर की खेती की जाएगी। मजदूरी का भुगतान भी मुंगेर विश्वविद्यालय द्वारा ही किया जाएगा।

शोध संस्थानों के वैज्ञानिक यहां के शोधार्थियों का करेंगे मार्गदर्शन :

डॉ. राय ने बताया कि, “करार के तहत यहां के शोधार्थी भारतीय रबर अनुसंधान संस्थान एवं हिमालय वन अनुसंधान संस्थान में जाकर रिसर्च सुविधाओं से लाभ प्राप्त कर सकेंगे। इन शोध संस्थानों के वैज्ञानिक भी बिहार आकर यहां के शोधार्थियों का मार्गदर्शन करेंगे।”

ठंडे प्रदेशों में उगाई जाने वाली अर्धवार्षिक फसल है रबर :

विदित हो कि, हीवीया ब्रेसिलियेंसिस नामक पेड़ रबर का पारंपरिक स्रोत है। इसका वैकल्पिक स्रोत रसियन डैनडेलियन और गुऔली नामक पौधे हैं। रसियन डैनडेलियन ठंडे प्रदेशों में पाये जाते हैं। इसकी फसल छह महीने में तैयार हो जाती है। इसलिए इसे भारत में उगाने के लिए प्राथमतः शिमला को चुना गया है। बिहार में भी तकरीबन चार–पांच महीने ठंड रहती है। इसके मद्देनजर यहां भी वैकल्पिक रबर के पौधों के उगाने पर बल दिया जा रहा है।

डॉ. संदीप कुमार टाटा के मार्गदर्शन में एक शोधार्थी पूर्व से है  प्रयासरत : 

इन पौधों को बिहार में लगाने से यहां के किसानों को भी भविष्य में फायदा होगा। मुंगेर जिले में रबर के पौधे उगाने की संभावनाओं के लिए वनस्पतिशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. संदीप कुमार टाटा के मार्गदर्शन में एक शोधार्थी पहले से ही प्रयासरत हैं।

होगा मील का पत्थर :

रबर के पारंपरिक तथा वैकल्पिक पौधे नकदी फसलें हैं। इसलिए बिहार के किसानों के लिए यह बहुत ही लाभदायक होगा और यदि यह सफल रहा तो बिहार में रबर की खेती पहली बार शुरू होगी। मुंगेर विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. घनश्याम राय कहा कि यह करार शोधार्थियों, शिक्षकों और विश्वविद्यालय के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

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Dr Ghanshyam Roy Dr. Sandip Kumar Tata Himalayan Forest Research Institute Shimla Indian Rubber Research Institute Kottayam Keral Munger University Munger
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