
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 डेस्क समस्तीपुर। बढ़ती जनसंख्या और घटती कृषि योग्य भूमि के बीच अंतरवर्ती खेती और समेकित कृषि समय की मांग है। शनिवार को डॉ राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के अधीनस्थ कृषि विज्ञान केन्द्र, बिरौली में प्रसार कार्यकर्ताओं के लिए आयोजित एकदिवसीय कौशल विकास एवं क्षमता संवर्धन प्रशिक्षण के दौरान उक्त बातें कही।
उन्होंने जोर देते हुए कहा, “आलू और मक्का का संयोजन एक लाभप्रद प्रणाली है। इससे न केवल प्रति इकाई क्षेत्र में उत्पादन बढ़ता है, बल्कि यह किसानों के लिए एक बीमा की तरह काम करता है—यदि किसी कारणवश एक फसल प्रभावित होती है, तो दूसरी फसल से लागत की भरपाई हो जाती है।
विदित हो कि कृषि के क्षेत्र में विविधीकरण और कम लागत में अधिक मुनाफे के लक्ष्य को हासिल करने केलिए अंतर्वर्ती कृषि प्रणाली और समेकित कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शनिवार को डॉ राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के अधीनस्थ कृषि विज्ञान केन्द्र, बिरौली में प्रसार कार्यकर्ताओं के लिए एकदिवसीय कौशल विकास एवं क्षमता संवर्धन प्रशिक्षण का आयोजन किया गया।
आलू एवं मक्का की अंतरवर्ती खेती विषय पर केंद्रित इस कार्यक्रम के दौरान डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिक डॉ. कौशल किशोर ने मक्का की खेती पर तकनीकी जानकारी साझा की।
जिसमें उन्होंने बताया कि मक्का की बुवाई के समय कतारों के बीच की दूरी का प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण है ताकि आलू की फसल को पर्याप्त धूप और स्थान मिल सके। साथ ही उन्होंने उत्तम प्रभेदों के बीजों के चयन और खरपतवार नियंत्रण के वैज्ञानिक तरीकों पर भी विस्तृत प्रकाश डाला।
वहीं उद्यानिकी विशेषज्ञ डॉ. धीरु कुमार तिवारी ने आलू की खेती के तकनीकी पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा कि आलू के साथ मक्का उगाने से मिट्टी की नमी बनी रहती है। उन्होंने आलू में लगने वाले रोगों, विशेषकर झुलसा रोग से बचाव और कंदों के विकास के लिए आवश्यक उर्वरकों के संतुलित प्रयोग के बारे में विस्तार से बताया।
इस दौरान उन्होंने कहा कि आलू और मक्का दोनों फसलें कम पानी चाहती हैं इसलिए एक बार में अधिक पानी देने की जगह पर हल्की सिंचाई को नियमित अंतराल पर करना ठीक रहता है। उन्होंने कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया कि वे किसानों को उन्नत किस्मों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें।
प्रशिक्षण सत्र के दौरान डॉ. रेड्डी फाउंडेशन के कार्यकर्ताओं ने वैज्ञानिकों के साथ सीधा संवाद किया। फील्ड में आने वाली समस्याओं, जैसे कि सिंचाई प्रबंधन और कीट नियंत्रण पर विशेषज्ञों ने उनकी शंकाओं का समाधान किया।
