
समस्तीपुर, 31 अक्टूबर 2025
विकास का ढिंढोरा पीटने वाली 20 वर्षों की सुशासन सरकार ने नये कल-कारखाने लगाना तो दूर, एक समय हजारों परिवारों के चूल्हे का सहारा, अंग्रेजों के जमाने में (1920) स्थापित वर्षों से बंद पड़े समस्तीपुर चीनी मिल, जुट मिल एवं पेपर मिल की सुधी तक नहीं ली। जबकि चुनाव घोषणा में बंद पड़े मिलों को चालू करने की घोषणा जोर-शोर से किया जाता रहा है।
उक्त बातें चीनी मिल चौक एवं आसपास महागठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में चलाये जा रहे जनसंपर्क अभियान के दौरान मतदाताओं को संबोधित करते हुए भाकपा माले जिला स्थाई समिति सदस्य सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने कही।
उन्होंने कहा कि जब हमारी जनसंख्या कम थी, उस समय चीनी मिल, पेपर मिल, जूट मिल समेत अन्य कल-कारखाने जिले के हजारों परिवारों के रोजगार का साधन था। लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध था लेकिन सरकार की अदूरदर्शिता के कारण कल-कारखाने के बंद होने से यहां से मजदूर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हैदराबाद की ओर रूख करने लगे।
भाकपा माले नेता ने कहा कि 20 वर्षों से सत्ताशीन नीतीश सरकार ने घोषणा की थी कि सभी बंद पड़े कल-कारखाने को चालू किये जाएंगे, उद्योग-धंधे लगाकर स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराये जाएंगे।
लेकिन 20 वर्षों में किसी ने समस्तीपुर के बंद पड़े इन मिलों की सुधी तक नहीं ली। नये उद्योग-धंधे नहीं लगाये गये। परिणामस्वरूप मिथिलांचल का प्रवेश द्वार समस्तीपुर मजदूर सप्लाई जोन बनकर रह गया।
हां चुनाव आते ही विभिन्न राज नेताओं द्वारा बंद पड़े चीनी मिल एवं पेपर मिल को चालू करने का मुद्दा जरूर छेड़ दिया जाता है लेकिन सरकार बनते ही इस दिशा में पहल करना तो दूर चर्चा तक करना मुनासिब नहीं समझती है।
उन्होंने चीनी मिल एवं पेपर मिल के जमीन पर कब्जा जमाने पर अफसोस जाहीर करते हुए कहा कि अगर चीनी मिल, पेपर मिल चालू नहीं हो सकता है तो उसके जगह पर कोई दूसरा उद्योग लगे या फिर इसका व्यवसायिक इस्तेमाल कर पलायन कर रहे युवाओं के लिए रोजगार मुहैया कराने की दिशा में सरकार को कदम उठाना चाहिए।