
Oini News Network
ओईनी 24 नई दिल्ली। मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान को लेकर विपक्ष की चिंताओं को शीर्ष अदालत का थोड़ा साथ मिला है। हलांकि सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर रोक नहीं लगाई है किन्तु इस मामले में विभिन्न दलों की याचिका पर सुनवाई के दौरान कई ऐसी अहम टिप्पणियां की है जो विपक्ष को मुस्कुराने का बहाना बन गयी है।
अपनी टिप्पणी में कोर्ट ने कहा कि, मतदाता सूची का संशोधन चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है, लेकिन इस प्रक्रिया को विधानसभा चुनाव से ठीक पहले शुरू करने के समय पर सवाल उठाया।
जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉय माल्य बागची की पीठ ने पूछा कि आयोग ने इस प्रक्रिया को इतनी देर से क्यों शुरू किया, जिससे यह चुनाव से जोड़ा जा रहा है।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि गैर-नागरिकों को मतदाता सूची से हटाना गृह मंत्रालय का विशेषाधिकार है, न कि चुनाव आयोग का।
दरअसल याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि SIR प्रक्रिया मनमानी और भेदभावपूर्ण है, क्योंकि यह मतदाताओं पर अपनी नागरिकता साबित करने का बोझ डालती है और पैन, आधार, राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों को स्वीकार नहीं किया जा रहा।
कोर्ट ने आयोग से पूछा कि यदि कोई मतदाता आवश्यक फॉर्म नहीं भर पाता, तो क्या उसका नाम मतदाता सूची में रहेगा।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं, बल्कि पहचान का दस्तावेज है, और मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित करने का कोई इरादा नहीं है।
शीर्ष अदालत ने प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने और अंतिम मतदाता सूची अधिसूचित करने से पहले सभी पक्षों को अवगत कराने का निर्देश दिया। साथ ही आधार कार्ड, वोटर कार्ड तथा राशन कार्ड को वोटर लिस्ट बनाने के लिये कंसीडर करने को कहा।
अगली सुनवाई 28 जुलाई 2025 को होगी।