
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
समस्तीपुर | बख्तियारपुर-ताजपुर फोरलेन परियोजना में बाढ़ जलनिकासी की अनदेखी को लेकर लंबे समय से चल रहे स्थानीय लोगों के संघर्ष ने अब असर दिखाना शुरू कर दिया है। बिहार राज्य सड़क विकास निगम लिमिटेड ने उक्त पथ के चार महत्वपूर्ण स्थलों पर बड़े बाढ़ निकासी पुल निर्माण की स्वीकृति दे दी है।
हालांकि इस बाबत जानकारी देते हुए जौनपुर निवासी घप्पू सिंह के पुत्र अभिनंदन कुमार ने बताया कि यह निर्णय किसी जन आंदोलन या विरोध प्रदर्शन का प्रत्यक्ष परिणाम नहीं है। परियोजना में शुरू से ही अनियमितताओं के आरोप लगते रहे, लेकिन उन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। स्थानीय लोगों द्वारा उठाए गए मुद्दे “कागज़ी कार्यवाही” तक ही सीमित रह गए थे।
लेकिन तस्वीर तब बदली जब गांव के कुछ प्रबुद्ध युवाओं ने सूचना के अधिकार के माध्यम से दस्तावेज़ जुटाए और कानूनी प्रक्रिया के ज़रिए जवाबदेही तय करने की ठोस एवं मजबूत कोशिश की।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि निर्माण कार्य डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) के विपरीत किया गया। कई प्राकृतिक जलधाराओं को बंद कर दिया गया और सड़क को इस तरह बनाया गया जैसे कोई बांध हो। 2024 में जौनापुर गांव में आई बाढ़ में एक घर पूरी तरह बह गया, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।
कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि DPR में जहां कलवर्ट प्रस्तावित थे, वहां निर्माण कंपनी के महाप्रबंधक और कुछ प्रभावशाली स्थानीय लोगों की मिलीभगत से उन्हें हटा दिया गया। प्राकृतिक जल स्रोतों में अवैध रूप से बालू भरकर उन्हें पाट दिया जाना स्पष्ट रूप से गैरकानूनी है।
उन्होंने बताया कि जनता के दबाव के बाद बीएसआरडीसीएल ने दो बार हाइड्रोलॉजिकल सर्वे करवाया। जिससे यह निष्कर्ष निकला कि मौजूदा जलनिकासी संरचनाएं अपर्याप्त हैं। इसके बाद निगम ने चार स्थानों पर बाढ़ निकासी पुलों के निर्माण को मंजूरी दी।
बताते हैं कि इस मुद्दे पर 24 से अधिक आरटीआई आवेदन, कानूनी शिकायतें, और सचिवालय स्तर पर 10 से अधिक बैठकें की गई। इस निरंतर प्रयासों के बाद बीएसआरडीसीएल की समस्तीपुर इकाई ने चार स्थानों पर बड़े पुल निर्माण की स्वीकृति दी। जिसमें कहा गया है कि निर्माण कार्य अब हाइड्रोलॉजिस्ट और स्ट्रक्चरल विशेषज्ञों की निगरानी में किया जाएगा। यह निर्णय बीएसआरडीसीएल के पत्र संख्या 208, दिनांक 5 मई 2025 के तहत लिया गया है।
वहीं, एक आरटीआई कार्यकर्ता ने बताया, “यह निर्णय किसी आंदोलन की वजह से नहीं, बल्कि ठोस दस्तावेजी प्रयासों और कानूनी दबाव की वजह से आया है। हमने हर स्तर पर साक्ष्य प्रस्तुत किए और यह दिखाया कि यदि ये पुल नहीं बने तो भविष्य में और जानमाल का नुकसान होगा।