
ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 डेस्क समस्तीपुर। एक तरफ सरकार और स्वास्थ्य विभाग लगातार हर जिले में प्रखण्ड स्तर पर उच्च गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने के दावे करती फिरती है। वहीं सर्वे सन्तु निरामया के तहत सेवा का संकल्प लेने और लाखों रुपए तनख्वाह लेने वाले धरती के भगवान का दर्जा प्राप्त चिकित्सक गंभीर मामलों में जिम्मेदारी लेने से भागते हैं।
जी हां! हम बात कर रहे हैं जिले के सबसे बड़े सरकारी स्वास्थ्य सेवा संस्थान सदर अस्पताल का। जहां से गंभीर मरीजों को इलाज देने के बजाय रेफर किए जाने का मामला लगातार सामने आ रहा है।
इसमें हैरानी की बात यह है कि अस्पताल में सर्जन सहित आवश्यक चिकित्सकीय व तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद गोली लगने, सड़क दुर्घटना और अन्य गंभीर रूप से घायल मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद सीधे दूसरे अस्पतालों के लिए भेज दिया जा रहा है।
विभिन्न मामलों में रेफर किए गए मरीजों के परिजनों का आरोप है कि सरकार द्वारा सदर अस्पताल को आधुनिक सुविधाओं, डॉक्टरों और संसाधनों से लैस किए जाने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन गंभीर मरीजों को भर्ती कर इलाज करने से कतराता है। नतीजतन, ऐसे मरीजों को दरभंगा, पटना, या निकट के निजी अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है, जिससे मरीजों के परिजनों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
बताया जाता है कि सदर अस्पताल की इमरजेंसी में अक्सर गंभीर रूप से घायल मरीज पहुंचते हैं, लेकिन वहां तैनात कुछ कर्मी और एंबुलेंस चालक कथित तौर पर निजी अस्पतालों से मिलीभगत कर मरीजों को वहीं ले जाने की सलाह देते हैं।
कई मामलों में परिजनों को यह कहकर डराया जाता है कि यहां इलाज संभव नहीं है या मरीज की हालत ज्यादा गंभीर है। हाल के आंकड़ों पर गौर करें तो यह स्पष्ट होता है कि छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़ दें तो गंभीर मामलों में अधिकांश मरीजों को रेफर किया जा रहा है।
खास कर सड़क दुर्घटना, गोलीकांड, गंभीर चोट या सर्जरी से जुड़े मामलों में अस्पताल में इलाज के बजाय मरीजों को बाहर भेजने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
इस हालत में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर सदर अस्पताल का उद्देश्य केवल प्राथमिक उपचार तक ही सीमित है?
इस संबंध में अस्पताल के एक चिकित्सा पदाधिकारी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर रेफर करने की वजह पूछने पर बताया कि, पहले तो आम तौर पर मरीज की हालत नियंत्रण से बाहर होने पर लोग मरीज को अस्पताल ले कर आते हैं।
कोई चिकित्सक अपने हाथों से किसी मरीज को मरता नहीं देखना चाहता। यह बात मरीज के परिजन नहीं समझते। मरीज की मृत्यु के बाद परिजनों के हंगामे और इलाज में सफल नहीं होने से उत्पन्न निराशा से बचने के लिए मरीज की गंभीर हालत देखते हुए रेफर कर दिया जाता है।