

ओईनी न्यूज नेटवर्क।
Oini 24 डेस्क समस्तीपुर। लोकतंत्र की रक्षा के लिए देश के भविष्य कहे जाने वाले बच्चों के भविष्य को तक पर रखना लोकतंत्र के महापर्व में प्रशासनिक परंपरा बन गई है। जिसके तहत हर बार चुनाव के मौसम में 45 से 50 दिनों के लिए विभिन्न चुनावी कार्यों के लिए शैक्षणिक कार्यों की बलि लेने की प्रथा है। जबकि आए दिन सरकार उच्च गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा मुहैया कराने के दम भरते नहीं थकती।
इसी कड़ी मैं समस्तीपुर में विधानसभा चुनाव निष्पक्ष और शांतिपूर्ण संपन्न कराने हेतु सशस्त्र बलों के आवासन हेतु जिले की विभिन्न महाविद्यालयों, उच्च माध्यमिक विद्यालयों, माध्यमिक विद्यालयों और मध्य विद्यालयों को चयनित किया गया है। जिसके कारण से विभिन्न प्रखंड शिक्षा पदाधिकारीयो के द्वारा डीएसपी सदर एवं अन्य के पत्रांक और दिनाक को उद्धृत करते हुए 03 अक्टूबर 2025 से ही संबंधित विद्यालयों में पठन – पाठन, कक्षा 9वीं और 11वीं के पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) और 10वीं और 12 वीं का परीक्षा प्रपत्र भरने के कार्य को निकटवर्ती मध्य विद्यालय और माध्यमिक विद्यालय में टैग कर हस्तांतरित कर दिया गया है।
गौरतलब है कि समस्तीपुर में चुनाव 6 नवम्बर को है। प्रखण्ड शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय से विद्यालय अधिग्रहण और चिन्हित विद्यालय में टैग किए जाने संबंधी पत्र जारी हुए 6 दिन बीत जाने के बाद भी संबंधित विद्यालय में अभी तक सशस्त्र बल का आगमन नही हुआ है।
इस मामले में प्रतिक्रिया देते हुए सामाजिक एवं शैक्षणिक कार्यकर्ता डॉ मिथिलेश कुमार ने कहा कि सशस्त्र बल के आगमन के कई दिन पहले विद्यालय हस्तांतरित हो जाने से छात्र – छात्रों का पठन – पाठन बाधित हो गया है। जिससे सरकार की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दावे पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है।
उन्होंने कहा कि कक्षा 9 वी और 11 वी पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) और 10 वी और 12 वी का परीक्षा फॉर्म भरने हेतु छात्र छात्राओं को अपने विद्यालय से हस्तांतरित विद्यालय में दौड़ भाग करना पड़ रहा है। जिससे उन्हें शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
डॉ मिथिलेश ने कहा कि कुल मिला कर देखा जाय तो सिर्फ प्रशासनिक अदूरदर्शिता के कारण छात्र – छात्रों के शिक्षा का अधिकार, बाल अधिकार, भोजन का अधिकार, समता का अधिकार और खेल का अधिकार बाधित हो रहा है।
डॉ कुमार ने कहा कि यह अदूरदर्शिता इसलिए है कि कई चिन्हित विद्यालयों में सशस्त्र बल को रहने के लिए आवश्यक कक्ष से कहीं अधिक कक्ष बचे पड़े है। जहां वर्ग संचालन, पंजीकरण और परीक्षा प्रपत्र आदि के कार्य सहज व सरलता पूर्वक संपादित किया जा सकता था।
निजी महाविद्यालयों में भी सशस्त्र बलों को ठहराया जा सकता था। जिस पर शिक्षा विभाग के पदाधिकारियो एवं प्रशासनिक पदाधिकारियों की नजर नहीं गई या उन्होंने इसकी जरूरत नहीं समझी।
ऐसे में सहज प्रश्न उठना लाजिमी है कि असामाजिक तत्वों पर नकेल कसकर निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध सशस्त्र बलों को विद्यालय के छात्र – छात्राओं से कैसा भय?