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Home » दलहनी फसलों के पंक्तिबद्ध बुवाई से बढती है उत्पादकता : डाॅ आरके तिवारी

दलहनी फसलों के पंक्तिबद्ध बुवाई से बढती है उत्पादकता : डाॅ आरके तिवारी

Dr. Sanjay KumarBy Dr. Sanjay Kumar12/04/2025No Comments3 Mins Read
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ओईनी न्यूज नेटवर्क।
समस्तीपुर । मूंग बिहार में उगाई जाने वाली ग्रीष्मकालीन दलहनी फसलों में महत्वपूर्ण फसल है। इसमें 23 से 24 प्रतिशत प्रोटीन के साथ-साथ विभिन्न मिनरल्स एवं विटामिन्स पाए जाते हैं। शनिवार को डाॅ राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के कृषि विज्ञान केन्द्र बिरौली के अध्यक्ष सह वरीय वैज्ञानिक डाॅ रविन्द्र कुमार तिवारी ने विज्ञप्ति जारी कर मूंग की बुवाई तकनीक की जानकारी साझा की।

इस क्रम में उन्हेांने कहा कि आम तौर पर मूंग की बुवाई केलिए 15 मार्च से 15 अप्रैल तक अनुकूल समय होता है। इससे देरी से बुवाई करने पर गर्म हवा तथा वर्षा के कारण फलियों को नुकसान होता है। अप्रैल में शीघ्र पकने वाली प्रजातियों को लगाना उत्तम होता है। डाॅ तिवारी ने बताया कि मूंग की खेती के लिए बुवाई से पूर्व एक हल्की सिंचाई कर लेनी चाहिए उसके पश्चात खेत को दो-तीन जुताई कर पाटा चला देना चाहिए। जुताई के समय सड़ी हुई गोबर खाद 5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। जायद मूंग की बुवाई केलिए 20 से 25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से पर्याप्त होता है।

उन्हेांने कहा कि बुवाई से पूर्व बीजों को उपचार जरूर कर लेना चाहिए। उपचार करने हेतु फफूंदनाशक दवा जैसे कार्बनडाजिम से 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लें । फफूंदनाशी से बीज उपचार के पश्चात बीजों को राइजोबियम एवं पीएसबी कलचर से उपचारित कर लें। राइजोबियम कल्चर से उपचारित करने के लिए 25 ग्राम गुड़ तथा 20 ग्राम राइजोबियम एवं पीएसबी कल्चर को 50 मीली लीटर पानी में अच्छी तरह से मिलकर 1 किलोग्राम बीज पर हल्के हाथ से मिलना चाहिए एवं बीज को 1 से 2 घंटे छायादार स्थान पर सुखाकर बुवाई के लिए उपयोग करना चाहिए।

डाॅ तिवारी ने बताया कि पंक्तिबद्ध बुआई से सिंचाई एवं निकाई गुडाई में सुविधा होती है साथ ही इससे अपेक्षाकृत उत्पादकता में भी गुणात्मक लाभ मिलता है। जायद मूंग को 30 से.मी. पंक्ति से पंक्ति तथा 5 से 7 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी पर बुवाई करें एवं बीज को 3 से 4 सेंटीमीटर गहराई पर बोना चाहिए जिससे अच्छा अंकुरण प्राप्त हो सके। सामान्य रूप से जायद मूंग में 20 किलो ग्राम नाइट्रोजन 40 किलोग्राम फास्फोरस तथा 20 किलोग्राम पोटाश का प्रयोग अंतिम जुताई के समय एक समान रूप में खेत में प्रयोग करना चाहिए। जायद मूंग के लिए आई.पी.एम 2-3, एस.एम.एल 668, पी.डी.एम 139 प्रभेदों का चयन करें।

उन्हेांने कहा कि जायद मूंग में हल्की मिट्टी वाली खेतों में 4 से 5 बार सिंचाई जबकि भारी मिट्टी वाली खेतों में दो से तीन बार सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है यह ध्यान रखना चाहिए की शाखाएं बनते समय तथा दाना भरते समय खेतों में नमी पर्याप्त रहे। मूंग की फलिया एक साथ पक कर तैयार नहीं होती है। पकी हुई फलियों को तुड़ाई तीन से चार बार में पूरी होती है। फलियों को धूप में अच्छी तरह सुखाकर दौनी करके दानों को अलग कर के दानों को धूप में सुखाकर ही भंडाररीत करना चाहिए। भंडारीत करते समय दानों में नमी का मात्रा 8 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

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कृषि सलाह मूंग की बुवाई तकनीक
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